भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

चतुर्थ अध्याय-४ ] [ ३६७ च्यवन हुए ।१५। च्यवन के बृहद्रथ बृहद्रथ के कुशाग्र, कुशाग्र के ऋषभ, ऋषभ के सत्यजीत, सत्यजीत के पुष्पवान् तथा पुष्पवान् के पुत्र नहुष हुए ।१६। बृहद्रथ की द्वितीय पत्नी के गर्भ से शत्रु पीडक जरासन्ध हुए । जरासन्ध के सहदेव, सहदेव के सोमापि और सोमापि के पुत्र श्रुतश्रवा हुए ।१७। श्रुतश्रवा के पुत्र सुरथ हुए । सुरथ के विदूरथ, विदूरथ के सार्वभौम, सार्वभौम के जयसेन, जयसेन के रथानीक और रथानीक के पुत्र क्रोधी स्वभाव के युतायु हुए ।१८। तस्माद्देवातिथिस्तस्मादृक्षस्तस्माद्दिलीपकः । तस्मात्प्रतीपकस्तस्य देवापिरहमोश्वर ! ।१६। राज्य शान्तनवे दत्वा तपस्येकधिया चिरम् । कलापग्राममासाद्य त्वा दिदृक्षुरिहागत ।२०। मरुणाऽनेन मुनिभिरेभिः प्राप्य पदाम्बुजम् । तव कालकरालास्याद्यास्याम्यात्मवता पदम् ।२१। तयोरेव वच श्रुत्वा कल्किः कमलोचनः । प्रहस्य मरुदेवापी समाश्वास्य समब्रवीत् ।२२। युवा परमधर्म्मज्ञौ राजानौ विदितावुभौ । मदादेशकरौ भूत्वा निजराज्यं भरिष्यथ . ।२३। युतायु के पुत्र देवातिथि हुए ! देवातिथि के ऋक्ष, ऋक्ष के दिलीप और दिलीप के पुत्र प्रतीपक हुए । हे प्रभो ! मैं उन्ही प्रतीपक का पुत्र देवापि हूँ ।१६। मैंने शान्तनु को अपने राज्य पर आसीन किया और स्वयं कलाप ग्राम मे रह कर एकचित्त हो तपस्या करता था । अब आपके दर्शन की कामना से ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ ।२०। मैंने मरु और मुनिवरो के सहित यहाँ आकर आपके चरणारबिन्द को प्राप्त किया है । इसके फल स्वरूप मैं काल के कराल गाल मे गिरने से बच गया, आत्म तत्वज्ञो का पद हमे मिल जायगा ।२१। मरु और देवापि की बातो को सुन कर पद्माक्ष कल्किजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होने आश्वासन भरे शब्दो मे उनसे कहा । कल्कि बोले—मै जान गया कि