कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय-३ ] [ ४०३ और एक हज़ार दिव्य वर्षों का कलियुग होता है ।१३। इन चारो युगो का सध्याक्रम ( संधिकाल ) क्रमश चार सौ, तीन सौ, दो सौ, और एक सौ वर्ष का होता है । इन चारो युगो की शेष सध्या का क्रम भी इसी प्रकार समझना चाहिये ।१३। एकसप्ततिकं तत्र युगं भुङ्क्ते मनुर्भुवि । मनूनामपि सर्वेषामेव परिणतिर्भवेत् । दिवा प्रजापतेस्तत्तु निशा सा परिकीर्त्तिता ।१४ अहोरात्रञ्च पक्षस्ते माससंवत्सरर्तवः । सद्गुणाधिकृतं कालो ब्रह्मणो जन्ममृत्युकृत् ।१५। शतसंवत्सरे ब्रह्मा लय प्राप्नोति हि त्वधि । लयान्ते त्वन्नाभिमध्यादुत्थितः सृजति प्रभुः ।१६। तत्र कृतयुगान्तेऽहं कालं सद्धर्म्मपालकम् । कृतकृत्याः प्रजा यत्र तन्नाम्ना मां कृतं विदुः ।१७। इति तद्वच आश्रुत्य कल्किर्निजजनावृतः । प्रहर्षमतुलं लब्धा श्रुत्वा तद्वचनामृतम् ।१८। अवहित्यमुपालक्ष्य युगस्याह जनान्हितान् । योद्धुकामं कलेः पुर्यां हृष्टो विशसने प्रभुः ।१६, गजरथतुरगान्नरराँश्च योधाम्कनकविचित्रविभूषणा- चिताङ्गान् । धृतविविधवरास्त्रशस्त्रशूगान्गुधिनिपु- णानगरायध्वमानयध्वम् ।२०। प्रत्येक मनु इकहत्तर चतुर्र्युगी तक पृथिवी को भोगते है । इसी प्रकार सब मनु बदलते रहते हैं । चौदहवे मनु जितने समय तक पृथिवी का भोग करते हैं, उतना समय ब्रह्मा का एक दिवस होता है । इतने ही परिमाण की ब्रह्मा की एक रात्रि होती ।१४। इसी प्रकार दिवस-रात्रि, पक्ष, मास, सवत्सर और ऋतु आदि की उपाधि से ब्रह्माजी की जन्म-मृत्यु आदि का विधान होता है ।१५। ब्रह्मा अपनी सौ वर्ष की आय पूर्ण होने पर वह स्वय मे लय हो जाते है । फिर