कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ अध्याय-३ ] [ ४०७ के अंश रूप तपोनिष्ठ नर-नारायण को तथा अपने स्त्री पुत्रादि को साथ लेकर धर्म शीघ्रता पूर्वक वहाँ आ गया ।११। श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री आदि धर्म की रक्षा मे तत्पर यह सभी साकार रूप में अपने बान्धवों से युक्त होकर कल्किजी के दर्शनार्थ और स्वकार्य निवेदनार्थ वहाँ उपस्थित हुए ।१२-१३। कल्किर्द्विजं समासाद्य पूजयित्वा यथाविधि । प्रोवाच विनयापन्नं कस्त्वं कस्मादिहागतः ।१४। स्त्रीभिः पुत्रैश्च सहितः क्षीणपुण्य इव ग्रहः । कस्य वा विषयाद्राजंस्तत्तत्त्वं वद तावतः ।१५। पुत्राः स्त्रियश्च ते दीना हीनस्वबलपौरुषाः । वैष्णवाः साधवो यद्वत्पाखण्डैश्च तिरस्कृताः ।१६। कल्केरिति वचः श्रुत्वा धर्मः शर्म निजं स्मरन् । प्रोवाच कमलानाथमनाथस्त्वतिकातरेः ।१७। पुत्रैः स्त्रीभिर्निजजनैः कृताञ्जलिपुटैर्हरिम् । स्तुत्वा नत्वा पूजयित्वा मुदितं तं दयापरम् ।१८। शृणु कल्के ममाख्यानं धर्मोऽहं ब्रह्मरूपिणः । तव वक्षःस्थलाज्जातः कामदं मवदेहिनाम् ।१९। भगवान् कल्कि ने ब्राह्मण को देखते ही विनय पूर्वक एवं विधिवत् उसका पूजन किया और बोले-आप कौन हैं ? कहाँ से आगमन हुआ ? ।१४। क्षीण पुण्य मनुष्य के समान आप अपने स्त्री पुत्रादि के सहित किस राज्य से यहाँ आये हैं, यह सब मुझे यथार्थ रूप में बताइये ।१५। जैसे वैष्णव साधु पाखण्ड के पराजित हो जाते हैं, वैसे ही आप बल-पौरुष से हीन होकर स्त्री पुत्रादि के सहित अत्यन्त कातर क्यो हो रहे हैं ? ।१६। अत्यन्त कातर और अनाथ रूप में आया हुआ धर्म पद्मा- पति कल्किजी के वचन सुन कर अपने कल्याणार्थ निवेदन करने लगा ।१७। उसने अपने अनुयायियों के सहित हाथ जोड़े और आनन्द-धाम