कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१० ] [ कल्कि पुराण सारथि, अग्नि आसन रूप आश्रय हुआ । इस प्रकार धर्म रूप नायक क्रियानुष्ठान रूपी महाबल से समन्वित होकर चल दिया । ३१ । यज्ञदानतप पात्रैयमैश्च नियमैर्वृतः । खशकाम्बोजकान्त्सर्वाञ्छबराञ्बर्व्वरापि ।३२। जेतु कल्किययौ यत्र कलेरावासमीप्सितम् । भूतवासबलोपेत सारमेयवराकुलम् ।।३३।। गोमासपूतिगन्धाढ्य काकोलूकशिवावृतम् । स्त्रीणा दुर्द्यूतक लहविवादव्यसनाश्रयम् .३४। घोर जगद्भूयकर कामिनीस्वामिन गृहम् । कलिः श्रुत्वोद्यमं कल्के पुत्रपौत्रवृत क्रुधा ।३५। पुराद्विशसनात्प्रायात्प्रे चकाक्षरथोपरि : धर्मः कलि समालोक्य ऋषिभि. परिवारितः ।३६। युयुधे तेन सहसा कल्किवाक्यप्रचोदित; । ऋतेन दम्भः सङ्ग्रामे प्रसादो लोभमाह्वयत् ।३७। इस प्रकार यज्ञ, दान, तप, यम, नियम आदि से सम्पन्न हुए भगवान् कल्कि खश, कम्बोज, शबर तथा बर्बर आदि म्लेच्छो की विजय कामना से कलि के आवास वाले स्थान मे पहुचे । वहा भूतो का दृढ आवास होने से उस स्थान मे सब ओर श्वान भूँकते थे । ३२-३३ । इस स्थान मे गो मास की दुर्गंध आ रही थी । कौओ और उल्लुओ से पूर्ण तथा द्यूत का आश्रय एव स्त्रियो के विवाद रूपी क्लेश इसमे भरा हुआ था ।३४। ससार के लिए भयप्रद यह नगरी भय कर प्रतीत होती थी । यहाँ के पुरुष स्त्रियो की आज्ञा के अनुवर्ती थे । वहाँ का अधीश्वर कल्कि जी का आक्रमण सुन कर अपने पुत्र-पौत्रादि के सहित उल्लू की ध्वजा वाले रथ पर आरूढ होकर विशसनपुरी से बाहर आया । उस कलि को देख कर भगवान् कल्कि की आज्ञानुसार ऋषियो के सहित धर्म ने उसके साथ सग्राम प्रारम्भ किया । दभ से ऋत और लोभ से प्रसाद भिड़ गया ।३५-३७।