कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ अध्याय-३ ] [ ४११ समयादभय क्रोधो भयं सुखमुपाययौ । निरयो मुदमासाद्य युयुधे विविधायुधैः ।३८। आधियोगेन च व्याधि क्षेमेण च बलीयसा । प्रश्रयेण तथा ग्लानिर्जरा स्मृतिमुपाह्वयत् ।३६। एव वृत्तो महाघोरो युद्ध परमदारुणः । त द्रष्टुमागता देवा ब्रह्माद्याः खे विभूतिभिः ।४०। मरु खशंश्च काम्बोजैर्युयुधे भीमविक्रमैः । देवापिः समरे चौनैर्बर्बरैस्तद्गणैरपि ।४१। विशाखयूपभूपाल पुलिन्दै श्वपचै सह । युयुधे त्रिविधे शस्त्रैरस्त्रैर्दिव्यैर्महाप्रभैः ।४२। कल्कि कोकविकोकाभ्या वाहिनीभिर्वरायुधै । तौ तु कोकविकोकौ च ब्रह्मणो वरदर्पितौ ।४३। क्रोध के साथ अभय और भय के साथ सुख का युद्ध होने लगा । निरय ने प्रीति के पास आकर उस पर शस्त्रास्त्रो से प्रहार किये ।३८। आधि से योग का, व्याधि से क्षेम का, ग्लानि से प्रश्रय का और जरा से स्मृति का संग्राम होने लगा ।३६। इस प्रकार अत्यन्त घोर एवं दारुण संग्राम उपस्थित हो गया । ब्रह्मादि देवगण अपनी-अपनी विभूतियो के सहित नभमण्डल मे स्थित होकर युद्ध देखने लगे ।४०। भीषण पराक्रमी खश और कम्बोजो से मरु का युद्ध हुआ । देवापि ने चौन और बर्बरों की सेना से संग्राम किया ।४१। विशाखयूप नरेश पुलिन्द और श्वपचादि से महा पराक्रमी विविध अपने दिव्यास्त्रो के सहित भिडे हुए थे ।४२। कोक-विकोक के साथ स्वय भगवान् कल्कि श्रेष्ठ शस्त्रास्त्र लेकर सेना सहित युद्ध मे तत्पर हुए । यह कोक-विकोक ब्रह्मा जी से वर प्राप्त करने के कारण अत्यन्त अहकारी हो गए थे ।४३। भ्रातरौ दानवश्रेष्ठौ मत्तौ युद्धविशारदौ । एकरूपौ महासत्त्वौ देवाना भयवर्द्धनौ ।४४। पदातिकौ गदाहस्तौ वज्राङ्गौ जयिनौ दिशाम् ।