कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१२ ] कल्कि पुराण शुम्भैः परिवृतौ मृत्युजितावेकत्र योधनात् ।४५। ताभ्यां स युयुधे कल्कि सेनागणसमन्वितः । शुभाना कल्किसैन्याना समरस्तुमुलोऽभवत् ।४६। ह्रषितैर्बृंहितैर्दन्तशब्दैष्टङ्कारनादितैः । शूरोत्कृष्टैर्बाहुवेगैः सशब्दस्तलताडनैः ।४७। संपूरिता दिशः सर्वा लोका नो शर्म लेभिरे । देवाश्च भयसन्त्रस्ता दिवि व्यस्तपथा ययुः ।४८। पाशैर्दण्डैः खड्गशक्त्यृष्टिशूलैर्गदाघातैर्बाणपातैश्च घोरैः । युद्धे शूराश्छिन्नबाहुद्विमध्याः पेतुः सख्ये शतशः कोटिशश्च दैत्यो मे श्रेष्ठ यह दोनो भाई घोर युद्ध मे प्रवीण, अत्यन्त बली और देवताओ को भयभीत करने मे समर्थ थे। इन दोनो का रूप एक सा था ।४४। यह दोनो दिग्विजयी, वज्र जैसे कठोर शरीर वाले थे। दोनो मिल कर मृत्यु को भी युद्ध मे जीत लेने मे समर्थ थे। अपनी बलवती सेना के सहित यह दोनो गदा धारण कर पैदल ही युद्ध मे तत्पर हुए ।४५। इन कोक-विकोक के साथ कल्कि जी का घोर संग्राम हो रहा था उनकी सेना के प्रमुख वीर भयकर युद्ध कर रहे थे ।४६। अश्वो का हींसना, हाथियो की चिघाड तथा दान्तो का शब्द, धनुषो की टकार, वीरो के भुजाघात आदि से भयप्रद भीषण शब्द होने लगा ।४७। उस शब्द से दसो दिशाएँ गूँज उठीं । कोई भी जीव भय-रहित नही था । देवता भी डर के कारण गगन मण्डल से उल्टे-सीधे मार्गों से भागने लगे ।४८। पाश, दण्ड, खड्ग, शक्ति, शूल, गदा तथा भयकर वाणो के आघात से करोडो शूरो के हाथ, पैर, कटि आदि विभिन्न अग कट-कट कर गिर रहे थे, जिनसे युद्ध भूमि आच्छादित होने लगी थी ।४६। —❀—