भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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तृतीयांश - सप्तम अध्याय एव प्रवृत्ते सङ्ग्रामे धर्मं परमकोपन । कृतेन सहितो घोर युयुधे कलिना सह. ।१। कलिर्दमित्रबाणौधैधर्मस्यापि कृतत्त्य च । पराभूत पुरी प्रायात्त्यक्त्वागर्दभवाहनम् ।२। विच्छिन्नपेचकरथ स्रवद्रक्ताङ्गसञ्चय । च्छुद्भगन्ध करालास्य स्त्रीस्वामिकमगाद्गृहम् ।३। दम्भ सम्भोगरहितनोद्धृतवाणगणाहत । व्याकुल स्वकुलागारो नि मार० प्राविशद्गृहम् ।४। लोभ प्रसादाभिहतो गदया भिन्नमस्तकः । सारमेयरथ च्छिन्न त्यक्त्वागाद्रुधिर वमन् ।५। श्रभयेन जित क्रोध कषायीकृतलोचन । गन्धाखुवाह विच्छिन्न त्यक्त्वा विशमन गत ।६। सूत जी ने कहा—इस प्रकार भयकर युद्ध होता देख कर मन्युग सहित धर्म ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक कलि से युद्ध प्रारम्भ किया ।१। तब धर्म और सत्युग की भीषण बाण वर्षा को न सह कर हारा हुआ कलि अपने वाहन गधे को वही छोड़ कर भागता हुआ अपनी पुरी मे घुस गया ।२। उल्लू की ध्वजा वाला उसका रथ चकनाचूर हो गया । उसके देह से रक्त बहने लगा, जिससे छछू दर की गन्ध निकल रही थी । मुख पर भयानकता आ गई थी । इस अवस्था को प्राप्त हुआ कलि अपनी स्वामिनी नारी के भवन मे प्रविष्ट हुआ ।३। इस प्रकार बाण वर्षा से आहत एव व्याकुल हुआ कलि दम्भ सम्भोगादि से रहित होकर ४१३