कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१४ ] [ कल्कि पुराण अपने कुल के अग र रूप से सार-हीन होता हुआ अपने गृह मे जा पहुंचा ।४। उधर प्रसाद द्वारा पदाघात को प्राप्त हुए लोभ का शिर कट गया । कुत्तो से युक्त उसका रथ छिन्न भिन्न हो गया । तब वह उसे छोड कर रक्त वमन करता हुआ रण क्षेत्र से भाग खडा हुआ ।५। अभय से युद्ध करता हुआ क्रोध भी हार गया । उसके छ नेत्रो मे लाली छाई थी । चूहो से युक्त दुर्गंध पूर्ण अपने छिन्न-भिन्न रथ को वही पडा छोड कर वह भी विशमनपुरी मे जा घुसा ।६। भय सुखतलाघाताद्गतासु र्यपतद्भुवि । निरयो मुदमुष्टिभ्या पीडितो यममाययौ ७। आधिव्याध्यादय सर्वे त्यक्त्वा वाहमुपाद्रवन् । नानादेशान्भयोद्विग्न कृतवाणाप्रपीडिताः ।८। धर्म. कृतेन सहितो गत्वा विशसन कलेः । नगर बाणदहनैर्ददाह कलिना सह ।६। कलिर्विप्लुष्टसर्वाङ्गो मृतदारो मृतप्रज. । जगामेको रुदन्दीनो वर्षान्तरमलक्षित. ।१०। मरुस्तु शककाम्बोजाञ्जघ्नेदिव्यास्त्रतेजसा । देवापि· शबरांश्चोलान्बर्बरास्तद्गणानपि ।११। दिव्यास्त्रशस्त्रसम्पातैर्दयामास वीर्यवान् । विशाखयूपभूपालः पुलिन्दान्पुक्कसानपि ।१२। सुख के तलाघात से आहत हुआ भय प्राण त्याग कर धराशायी हुआ । प्रीति के मुष्टि प्रहार से पीडित हुआ निरय भी तुरन्त ही यमा- लय को चला गया ।७। सत्युग के बाणो से आहत हुई आधि-व्याधि अपने वाहनो का परित्याग करके इधर-उधर भाग गईं ।८। इसके पश्चात् सत्युग को साथ लेकर धर्म कलि की राजधानी विनशन में प्रविष्ट हुआ और उसने कलि के सहित सम्पूर्ण नगर को अपनी बाणा- ग्नि से जला दिया ।६। कलि के सभी अग जल गये । उसकी संतति और पत्नी भी मरण को प्राप्त हुई और वह स्वय रोता हुआ अप्रकट रूप