कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश — अष्टम अध्याय सेनागणै परिवृतः कल्किर्नारायण प्रभु । भल्लाटनगर प्रायात्खड्ग् धृक्सप्तिवाहन ।१। स भल्लाटेश्वरो योगी ज्ञात्वा विष्णु जगत्पतिम् । निजसेनागणैः पूर्णो योद्धुकामो हरि ययौ ।२। स हर्षोत्पुलक श्रीमान्दीर्घाङ्गः कृष्णभावन । शशिध्वजो महातेजा गजायुतबलः सुधी ।३। तस्य पत्नी महादेवी विष्णुव्रतपरायणा । सुशान्ता स्वामिन प्राह कल्किना योद्धुमुद्ययम् ।४। नाथ कान्त जगन्नाथ सर्वान्तर्यामिन प्रभुम् । कल्कि नारायण साक्षात्कथं त्वं प्रहरिष्यसि ।५। सुशान्ते परमो धर्म्मः प्रजापतिविनिर्मित । युद्धे प्रहार (सर्वत्र गुरौ शिष्ये हरेरिव ।६। सूत जी बोले — तदनन्तर अपने अश्व पर आरूढ हुए कल्कि जी खडग धारण किये हुए, सेना के सहित भल्लाट नगर मे पहुँचे ।१। योगिराज भल्लाट नरेश ने कल्कि जी को साक्षात् जगदीश्वर विष्णु जाना और वह उनसे युद्ध करने के लिए सेना सहित नगर से बाहर चले ।२। उस समय वह दीर्घाग, श्रीमान्, कृष्ण भक्त, महाबली एव महा तेजस्वी राजा शशि ध्वज हर्ष से पुलकित हो रहे थे ।३। उन राजा की पत्नी विष्णु व्रत-परायणा महादेवी सुशान्ता थी । उसने जब अपने पति को कल्कि जी से युद्ध के लिए जाने को उद्यत देखा तब वह कहने लगी ।४। हे नाथ ! हे स्वामिन् ! कल्कि जी तो साक्षात् जगन्नाथ विष्णु ४२०