कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय-३ ] [ ४२१ और सर्वान्तर्यामी है। आप उन पर प्रहार कैसे कर सकेंगे ? ।५। शशिध्वज बोले—हे सुशान्ते ! प्रजापति ब्रह्माजी ने जो धर्म निश्चित किया है, उसके अनुसार युद्धेच्छुक गुरु, शिष्य अथवा नारायण ही क्यो न हो, उन सब पर प्रहार करना चाहिए ।६। जीवतो राजभोग स्यान्मृत स्वर्गे प्रमोद्ते । युद्धे जयो वा मृत्युर्वा क्षत्रियाणा सुखावह ।७। देवत्व भूपतित्व वा विषयाविष्टकामिनाम् । उम्पदाना भवेदेव न हरे पादसेविनाम् ।८। त्व सेवकः स चापीशस्त्व निष्काम स चाप्युद्म । युवयोर्युद्धमिलन कथ मोहाद्भविष्यति ।६। द्वन्द्वा तीते यदि द्वन्द्वमोध्वरे सेवके तथा । देहावेशाल्लीलयैव सा सेवा स्यात्तथा मम ।१०। देहावेशादीश्वरस्य कमान्या दंहिका गुण । मायाङ्ग यदि जायन्ते विषयाश्च न कि तथा ।११। ब्रह्मात्रो ब्रह्मतेशस्य शरीरित्वे शरीरिता । सेवकस्याभेददृशस्तेवेव जन्मलयोदयाः ।१२। यदि युद्ध भूमि से सकुशल लोट आवे तो वह अखण्ड राज्य का भोगने वाला होता है और यदि मृत्यु हो जाय तो स्वग की प्राप्ति होती है। इस प्रकार क्षत्रियो के लिये विजय और मरण दोनो मे ही सुख की उपलब्धि है ।७। सुशान्ता ने कहा-हे नाथ ! कामी अथवा विषया- सक्त पुरुषो के लिए ही युद्ध मे विजय अखण्ड राज्य के देने वाली और मृत्यु देवत्व प्रदान करने वाली होती है। परन्तु हरि-चरणो के सैदको को उससे क्या प्रयोजन है ? ।८। आप हरि-सेवक है। वह ईश्वर आप निष्काम को फल प्रदान नही करेगे । तब आप दोनो मे मोह पूर्वक युद्ध कैसे सभव है ? ।६। शशिध्वज बोले—परम पुरुष परमात्मा तो सुख दुःख रूपी सब द्वन्दो से परे है। परन्तु उनके देह धारण कर लेने पर उन ईश्वर और सेवक मे युद्ध होने लगे तो उसे