कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२२ ] [ कल्कि पुराण सेवा-स्वरूप विलाप लीला मात्र ही समझना चाहिये ॥१०। ईश्वर के अवतार धारण करने पर कामादि माया अंश रूप दैहिक गुणों का समन्वित होना भी अनिवार्य है । जब कामादि विषयों का आरोपित होना देह-धर्म ही है, तो उनके शरीर मे भी वह क्यो नही व्याप्त होगे ? ।१। पूर्ण ब्रह्मभाव सम्पन्न ईश्वर ब्रह्म कहे जाते है और जब वह शरीर धारण कर लेते हैं तब उन्हें शरीरिता कहते है । सेवक की भेद दृष्टि के लय होने अर्थात् अभेद-ज्ञान की उपलब्धि होने पर उसका जन्म लय और उदय भी उसी प्रकार सम्भव है ।१२ । सेव्यसेवकता विष्णोर्माया सेवेति कीर्त्तिता । द्वैताद्वैतस्य चेष्टैषा त्रिवर्गजनिका सताम् ॥१३। अतोऽहं कल्किना योद्धुं यामि कान्ते स्वसेनया । त्वञ्च पूजय कान्तेऽद्य कमलारतिमीश्वरम् ॥१४। कृतार्थोऽहं त्वया विष्णुसेवासम्मिलितात्मना । स्वामिन्निह परत्रापि वैष्णवी प्रथिता गति ॥१५। इति तस्या वल्गुवाग्भिः प्रणतायाः शशिध्वजः । आत्मानं वैष्णवं मेने साश्रुनेत्रो हरिं स्मरन् ॥१६। तामालिङ्ग्य प्रमुदितः शूरैर्बन्धुभिरावृतः । वहन्नाम स्मरन्नूरुं वैष्णवैर्योद्धुम ययौ ॥१७। गत्वा तु कल्किसेनाया विद्राव्य महती चमूम् । शय्याकर्णाग्रणीर्वीरैः सन्नद्धै रुचितायुधैः ॥१८। सेव्य-सेवक भाव ही सेवा है । यह कार्य विष्णु-माया का ही है । इस द्वैताद्वैत चेष्टा के द्वारा ही सत्कर्मी पुरुष त्रिवर्ग को प्राप्त कर लेते हैं ।१३। हे कान्ते ! यही कारण है कि मैं अपनी सेना के सहित कल्किजी से युद्ध करने के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ । हे प्रिये ! इधर तुम कमलापति भगवान् विष्णु का पूजन करो ।१४। सुशान्ता ने कहा— हे नाथ ! आप विष्णु सेवा द्वारा उन्हीं मे लीन हो गये, इससे मैं भी धन्य हो गई हूँ । इहलोक और परलोक मे भगवान् विष्णु की सेवा के