कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय ] [ ४२७ अनुजं वीक्ष्य देवापिमूर्ध्नि सूर्यध्वजोऽवधीत् । मुष्टिना वज्रपातेन सोऽपतन्मूर्च्छितो भुवि । मूच्छितस्थं रिपुं क्रोधासेनागणमताडयत ॥४४॥ शशिध्वज सर्वजगन्निवास कल्कि पुरस्तादभिसूर्यवर्चसम् श्याम पिशङ्गाम्बरमम्बुजेक्षणं । वृहद्भुजं चारुकिरीटभूषितम् ॥४५॥ नानामणिवातचिताङ्गशोभया निरस्तलोकेक्षणहृत्तमोमयम् विशाखयू पादिभिरावृतं प्रभु ददर्श धर्मेण कृतेन पूजितम् ॥४६ फिर उस घोर युद्ध मे बृहत्केतु ने देवापि के घोड़ो और सारथि को मार डाला । तब देवापि ने भी धनुष छोड कर शत्रु पर हथेली का प्रहार किया ।४२। फिर उसे दोनो भुजाओ मे दबा कर मर्दन करने लगा । उस समय अट्ठाईस वर्षीय वह राजपुत्र बृहत्केतु पीडित होता हुआ मूच्छित हो गया ।४३। अपने छोटे भाई की ऐसी दशा देखकर सूर्यकेतु ने देवापि के मस्तक पर वज्र के समान मुष्टिका-प्रहार किया, इससे देवापि मूच्छित होकर गिर पडा । तब शत्रु को मूच्छित जान कर सूर्यकेतु उसकी सेना पर प्रहार करने लगा ।४४। इधर राजा शशिध्वज ने उस रणक्षेत्र में सूर्यके समान तेजोमय, विश्वाधार, कमलाक्ष, पीताम्बर धारी, विशाल भुजा वाले और सुरम्य किरीट से सुशोभित कल्किजी को अपने सामने देखा ।४५। अनेक मणियो से सुसज्जित अङ्ग वाले, प्राणियो के नेत्रो और हृदयोँ के अन्धकार को नष्ट करने वाले कल्किजी के सब ओर विशालयूप नरेश जैसे अनेक राजागण नत-मस्तक खडे हैं तथा सत्य और धर्म उनका पूजन कर रहे हैं ।४६। •••