कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश— नवम अध्याय हृदि ध्यानास्पद रूपं कल्केर्दृष्ट्वा शशिध्वजः । पूर्णं खड्गधरं चारुतुरगारूढमब्रवीत् ॥१॥ धनुर्बाणधरं चारु-विभूषणावरोङ्कतम् । पापतापविनाशार्थमुद्यतं जगतां परम् ॥२॥ प्राह तं परमात्मानं हृष्टरोमा शशिध्वजः । एह्येहि पुण्डरीकाक्ष ! प्रहारं कुरु मे हृदि ॥३॥ अथवात्मन् बाणभिया तमोऽन्धे हृदि मे विश । निर्गुणस्य गुणज्ञत्वमद्वैतस्यास्त्रताडनम् ॥४॥ निष्कामस्य जयोद्योगसहायं यस्य सैनिकम् । लोकाः पश्यन्तु युद्धे मे द्वैरथे परमात्मनः ॥५॥ परबुद्धिर्यदि दृढा प्रहर्त्ता विभवे त्वयि । शिवविष्णोर्भेदकृते लोकं यास्यामि सयुगे ॥६॥ सूतजी ने कहा—हे ऋषियो ! कल्किजी का हृदय में ध्यान के योग्य, सुन्दर, खड्गधारी एवं तुरंगारूढ पूर्ण स्वरूप देख कर शशि- ध्वज ने विचार किया।१। धनुर्बाणधारी सुन्दर आभूषणों से विभूषित जगदीश्वर भगवान् कल्कि का अवतार संसार के पाप-ताप के निवारणार्थ हुआ है ।२। राजा शशिध्वज ने पुलकित शरीर से परब्रह्म कल्किजी के प्रति निवेदन किया—हे पुण्डरीकाक्ष ! आइये, मेरे हृदय पर प्रहार कीजिये ।३। हे परमात्मन् ! मेरे बाणों की मार से बचने के लिए मेरे तमाच्छादित हृदय में आकर छिप जाओ । जो निर्गुण होकर भी गुणों के ज्ञाता हैं, जो अद्वैत होकर भी अस्त्र प्रहार में तत्पर हैं तथा जो निष्काम होकर भी विजय की इच्छा से सैन्य-संहार कर रहे हैं मैं उन्हीं