भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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सर्पास्त्र नष्ट होने लगे ।१०। इस प्रकार विविध भाँति के दिव्यास्त्रो के द्वारा वे दोनो भीषण प्रहारमे तन्मय थे । इसमे लोक और लोकपाल सभी यह समझते हुए कि कही आज ही प्रलय न हो जाय, अत्यन्त भयभीत हुए ।११। बाणाग्नि का देख कर युद्ध देखने के लिए गगन मण्डल मे एकत्र हुए देवता भयभीत हो गये । दिव्यास्त्रो को व्यथ हुए देख कर कल्किजी और राजा शशिध्वज दोनो बाहु युद्ध के निमित्त अस्त्र त्याग कर उतर पडे । फिर पदाघात, करतलाघात और मुष्टिका-प्रहार से युद्ध होने लगा ।१२-१३ । नियुद्धकुशलो वारौ मुमुदाते परस्परम् । वराहोद्धूनशब्देन त तलेनाहनद्धरिः ।१४। स मूर्च्छितो नृपः कोपात्समुत्थाय च तत्क्षणात् । मुष्टिभ्या वज्रकल्पाभ्यामवध त्कल्कि मोजसा । स कल्किस्तत्प्रहारेण पपात भुवि मूर्च्छित ।।१५।। धर्म्म. कृतञ्च तं दृष्ट्वा मूर्च्छित जगदीश्वरम् । समागतौ तमानेतु कक्षौ तौ जगृहे नृप ।।१३।। कल्कि वक्षस्युपादाय लब्धार्त्त प्रययौ गृहम् । युद्धेन नृपाणामन्येषा पुत्रौ दृष्ट्व सुदुर्ज्जयौ ।।१७।। दोनो ही रणविद्या मे अत्यन्त कुशल थे और परस्पर एक दूसरे के कौशल को देखते हुए प्रसन्न हो रहे थे । सृष्टि के आरम्भ मे पृथिवी का उद्धार करने के लिए वाराह भगवान् ने जैसा शब्द किया था, कल्किजी द्वारा किये गये करतलाघात से वैसा ही भीषण शब्द हुआ ।१। उस आघात से राजा शशिध्वज मूर्च्छा को प्राप्त हो गए ॰ फिर तुरन्त ही सचेत होकर उन्होने कल्किजी पर वज्र के समान मुष्टि प्रहार किया, जिससे कल्किजी अचेत होकर पृथिवी पर लेट गये ।१५। तब जगत्पति कल्किजी को मूर्च्छित देख कर धर्म और सत्युग, वहाँ आकर उन्हे ले जाने लगे । परन्तु राजा शशिध्वज ने उन दोनो को कांख मे दबा लिया ।१६। और कल्किजी को अङ्क मे उठा कर कृत कृत्य होते हुए

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