भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

नवम अध्याय ] [ ४३१ उन्हे अपने घर ले गये और सोचने लगे कि मेरे दोनो पुत्रो को भी युद्ध मे कोई राजा जीत नही सकता है ।१७। कल्कि सुराधिपपति पृधने विजित्य धर्म्म कृतञ्च । निजकक्षयुगे निधाय । हर्षोल्लसद्धृदय उत्पुलक । प्रमाथी गत्वा गृह हरिगृहे ददृशे सुशान्ताम् ॥१८॥ दृष्ट्वा तस्या. सुललितमुख वैष्णवीनाञ्च मध्ये गायन्तीना हरिगुणकथारतामथ प्राह राजा । देवानाना विनयवचसा शम्भले जन्मनावा । विद्यालाभ परिणयविधि म्लेच्छपाषण्डनाशम् ॥१६॥ कल्किः स्वय हृदि समायमिहागोऽद्धा मूर्च्छिच्छ- लेन तव सेवनीक्षणार्थम् । धर्म्म कृतञ्च मम कक्षा- युगे सुशान्ते ! कान्ते विलोकय समर्च्यय सविधेहि ॥२०॥ इति नृपवचसाविनोदपूर्णा हरिकृत धम्म युत प्रणम्य नाथम् सह निजसखिभिनंनर्त्त रामा हरिगुणकीर्त्तनवर्त्तना विलज्जा। इस प्रकार देवराज इन्द्र के भी स्वामी कल्किजी को हरा कर और धर्म तथा सत्युग को काँख दवा कर राजा शशिध्वज प्रसन्न हृदय से सेनाओ का मर्दन करता हुआ अपने घर को गया और वहाँ उसने अपनी भार्या सुशान्ता को विष्णु मन्दिर मे स्थित पाया ।१८। उसके चारो ओर वैष्णवी नारियां बैठ कर विष्णु-गुण-गान में तन्मय थी । राजा ने सुशान्ता का सुन्दर मुख देखते हुए कहा—हे सुशान्ते ! देवताओ की प्रार्थना पर जो शम्बल ग्राम मे अवतीर्ण हुए हैं और जिन्होने विद्या प्राप्त कर म्लेच्छो और पाखण्डियो को नष्ट कर दिया है, वही हृदयो मे विहार करने वाले कल्कि भगवान अपनी माया द्वारा मूर्च्छा रूपी छल से आवृत होकर तुम्हारी शक्ति की परीक्षा लेने के निमित्त यहाँ पधारे हैं । मेरी काँखो मे यह धर्म और सत्युग दोनो दबे हुए है, तुम इनका पूजन करो ।१६-२०। राजा के यह विनोदपूर्ण वचन सुन कर रानी बडी प्रसन्न हुई और धर्म तथा सत्युग के सहित कल्किजी को उसने प्रणाम किया । फिर लज्जा को छोड कर सखियो के सहित हरि नाम संकीर्त्तन और नृत्य करने मे तत्पर हुई ।२१।