भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

तृतीयांश — दशम अध्याय जयहरेऽमराधीशसेवित तव पदाम्बुज । भूरिभूषणम् कुरु ममाग्रतः साधुसत्कृत त्यज महामते । मोहमात्मनः ।।१।। तव वपुर्जगद्रूपसम्पदा विरचितं सता मानसे स्थितम् । रतिपतेर्मनोमोहदायक कुरु विचेष्टित कामलम्पटम् ।।२।। तव यशो जगच्छोकनाशन मृदुकथामृतप्रीतिदायकम् । स्मितसुधोक्षित चन्द्रवन्मुख तवकरोत्वल लोकमङ्गलम् ।।३।। मम पतिस्त्वय सर्वदुर्जयो यदि तवाप्रिय कर्मणाचरेत् । जहि तदात्मनः शत्रुमुद्यत कुरु कृपा न चेदोटगीश्वर ।।४।। महदहयुत पञ्चमात्रया प्रकृतिजायया निर्मिंत वपु । तव निरीक्षणल्लीलया जगत्स्थितिलयोदयं ब्रह्मकल्पितम् ।५। सुशान्ता बोली—हे हरे ! आपकी जय हो । महामते ! अब आप अपने इस महोच्छन्न भाव को त्याग कर इन्द्र से भी सेवित, सुन्दर आभूषणों से विभूषित तथा साधुओ के द्वारा सत्कारित अपने चरणारविन्द मेरे समक्ष कीजिये ।१। जगत् की श्रेष्ठ सम्पदा से विर- चित तथा साधुओ के हृदय मे विद्यमान रहने वाला आपका यह देह कामदेव को भी मोहित करने वाला है । अब आप हमारी कामना पूर्ण कीजिये ।२। आपके यशगान से जगत् के शोक नष्ट होते हैं, आपके मुस्कान सुधा सम्पन्न चन्द्र वदन से निकली हुई मधुर वाणी सब को प्रसन्न करती है । हे प्रभो ! आपका यह मुख लोककल्याण के करने