कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश— त्रयोदश अध्याय इति भूत सभाया स कथयित्वा निजाः कथाः । शशिध्वज प्रीतमना प्राह कल्कि कृताञ्जलि ।१॥ त्वंहि नाथ त्रिलोकेश एतेभूपास्त्वदाश्रया. मा तथा विद्धि राजन् त्वन्निदेशकर हरे ।२॥ तपस्तप्तु यामि काम हरिद्वार सुनिप्रियम् । एते मत्पुत्रपौत्राश्च पालनीयास्त्वदाश्रया. ।३॥ ममापि काम जानासि पुरा जाम्बवतो यथा । निधन द्विविदस्यापि तदा सर्व सुरेश्वर ।४। इत्युक्त्वा गन्तुमुद्युक्त भार्यया सहित नृपम् । लज्जयाधोमुख कल्कि प्राहूर्भूपा किमित्युत ।५। सूतजी बोले—सभा मे उपस्थित सब जनो के समक्ष इस प्रकार अपना वृत्तान्त कहने के उपरान्त राजा शशिध्वज ने हाथ जोड कर कल्कि जी से कहा ।१। राजा बोले—हे हरे ! हे त्रिलोकेश ! यह सभी राजा- गण आपके आश्रय में स्थित हैं । आप इन सबको और मुझे भी अपनी आज्ञा के पालन मे तत्पर समझिये ।२। अब मैं ऋषियो के लिए प्रिय हरिद्वार के लिए तपस्या हेतु गमन करूँगा । मेरे यह पुत्र-पौत्रादि सब आपके ही आश्रित हैं और आपके द्वारा ही प्रतिपालन करने योग्य हैं ।३। हे सुरेश्वर ! आप मेरे अभिप्राय को भले प्रकार जानते हैं । अपने पूर्व अवतार मे आपने जाम्बवन्त और द्विविद आदि जिन वानरोका वध किया ४५४