भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

त्रयोदश अध्याय ] [ ४५५ था वह भी आपको स्मरण है ।४। यह कह कर राजा शशिध्वज अपनी पत्नी सुशान्ता सहित प्रस्थान के लिए उद्यत हुए । उस समय कल्किजी ने अपना मुख लज्जा से झुका लिया । यह देख कर राजागण उसे जानने की इच्छा से बोले ।५। हे नाथ किमनेनोक्तं यच्छ्रुत्वा त्वमधोमुखः । कथ तद्ब्रूहि कामं नः किं न शाधि संशयात् ।६। अमुं पृच्छत वो भूपा युष्माकं संशयच्छिदम् शशिध्वजं महाप्राज्ञं मद्भक्तिकृतनिश्चयम् ।७। इति कल्केर्वचः श्रुत्वा ते भूपाः प्रोक्तकारिणः । राजानं तं पुनः प्रहुः संशयापन्नमानसाः ।८। किं त्वया कथितं राजञ्छशिध्वज महामते । कथं कल्किस्तद्वदिदं श्रुत्वैवाभूदधोमुखः ।६। पुरा रामावतारेण लक्ष्मणादिन्द्रजिद्वधम् लक्ष्यालक्ष्यं द्विविदा राक्षसन्त्वात्सदारुणात् ।१०। राजाओ ने कहा—हे नाथ ! राजा शशिध्वज ने ऐसी क्या बात आपसे कही थी, जिसे सुन कर आपने लज्जा से अपना मुख नीचा कर लिया था । यह हमारे प्रति कह कर हमारा सन्देह दूर करिये ।६। कल्किजी बोले—हे राजाओ ! आप उन्ही महाराज शशिध्वज से ही इस विषय में प्रश्न करिये । क्योंकि वे परम ज्ञानी और मुझमें अनन्य भक्ति रखने वाले हैं। वे ही आपके सन्देह को नष्ट करेंगे।७। यह सुनकर सभी राजागण संशययुक्त हृदय से राजा शशिध्वज से प्रश्न करने लगे । उन्होने कहा—हे राजन् ! हे महामते ! हे महाराज शशिध्वज ! आपने अभी ऐसी कौन-सी बात कल्किजी के प्रति कही थी, जिसे सुन कर वे लज्जावनत मुख वाले हो गये थे ।८-६। शशिध्वज बोले—हे राजागण ! पुरा काल में जब रामावतार हुआ था, तब लक्ष्मणजी के द्वारा वध को प्राप्त हुए इन्द्रजीत मेघनाद की राक्षस भाव से मुक्ति हो गई थी ।१०।