कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश-अध्याय-३ ] [ ४५७ इति तस्य वर लब्ध्वा चिरायु सुस्यत्रानराः । बलरामास्त्रभिन्नात्मा मोक्षमापाकुतोभयम् ॥१६॥ तथा क्षेत्रे सूतपुत्रो निहतो लोमहर्षण । बलरामास्त्रयुक्तात्मा नैमिषेऽभूत्स्ववाञ्छया ॥२०। तब लक्ष्मणजी ने उसे आश्वासन दिया कि अगले जन्म मे जब मैं बलदेवावतार लूँगा, तब तुम मेरे हाथ से मृत्यु को प्राप्त होकर वानर भाव से मुक्त हो जाओगे ॥१६॥ “समुद्र स्योत्तरे तीरे द्विविदो नाम वानरः” यही वह मन्त्र है, जिसे लिखा हुआ देखने पर ऐकाहिक ज्वर नष्ट होजाता है ॥१७। इस मन्त्र को द्वार पर अथवा ताल । पत्र पर लिख कर देखना चाहिये तब ऐकाहिक ज्वर का नाश होना सम्भव है ॥१८। लक्ष्मणजी से इस प्रकार वर को प्राप्त हुआ वह द्विविद नामक वानर स्वस्थ शरीर से बहुत काल जीवित रहा और बलदेवजी का अवतार होने पर उनके अस्त्र से मृत्यु को प्राप्त होकर अभयात्मिका मुक्ति को प्राप्त हो गया ॥१६। इसी प्रकार अपनी इच्छा से सूत पुत्र लोमहर्षण भी नैमिषारण्य मे बलदेव जी के अस्त्र से ही मारे गये ॥२०। जाम्बंवाश्च पुरा भूपा वामनत्व गते हरौ : तस्याप्यूर्ध्वगतं पाद तत्र चक्रे प्रदक्षिणम् ॥२१। मनोजवं त निरीक्ष्य वामनः प्राह विस्मित । मत्तो वृणु वर काममृक्षाधीश महाबल ॥२२। इति त हृष्टवदनो ब्रह्माङ्गो जाम्बवान्मुदा । प्राह भो चक्रदहनान्मम मृत्युर्भविष्यति ॥२३। इत्युक्ते वामन प्राहकृष्णजन्मनि मे तव । मोक्षश्चक्रेण संभिन्नशिरसः सम्भविष्यति ॥२४। मम कृष्णावतारे तु सूर्यभक्तस्य भूपतेः । सत्राजितस्तु मण्यर्थे दुर्वाद समजायत ॥२५। हे राज्ञाग्रो ! वामनावतार मे वामनजी ने जब तीन पग में ही तीनो लोकों को नाप लिया, तब उनके ऊर्ध्वलोक मे रखे हुए चरण की