कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ ] कल्कि पुराण जाम्बवत ने प्रदक्षिणा की थी ।२१। उस समय उस जाम्बवान् को मन के समान द्रुत वेग वाला देख कर वामनजी अत्यन्त आश्चर्य चकित होकर बोले—हे ऋक्षाधीश ! तुम महाबली हो, मुझसे इच्छित वर मांगो ।२२। यह सुन कर हर्षित मन हुए ब्रह्मांश रूप जाम्बवान् ने कहा कि हे प्रभो ! मेरी मृत्यु आपके चक्र से हो, यही वर प्रदान कीजिये ।२३। जाम्बवान् के वचन सुन कर वामनजी ने कहा—कृष्णावतार मे मेरे चक्र से तुम्हारा शिर कटेगा और तुम मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे ।२४। तदनन्तर कृष्णावतार हुआ । उस समय मैं सूर्य का भक्त सत्राजित् नामक एक राजा हुआ था। तब एक मणि के कारण दुर्वाद उत्पन्न हो गया ।२५। प्रसेनस्य मम भ्रातुर्वधस्तु मणिहेतुकः । सिंहात्तस्यापि मण्यर्थे वधो जाम्बवता कृतः ।२६। दुर्वादभयभीतस्य कृष्णस्यामिततेजस । मण्यन्वेषणचित्तस्य ऋक्षेणाभूद्रणो बिले ।२७। स निजेशं परिज्ञाय बच्चाक्रग्रस्तबन्धनम् । मुक्तो बभूव सहसा कृष्ण पश्यन्सलक्ष्मणम् ।२७। नवदूर्वादलश्याम दृष्ट्वा प्रादान्निजात्मजाम् । तदा जाम्बवती कन्या प्रगृह्य मणिना सह ।२६। द्वारका पुरमागत्य सभाया मामुपाह्वयत् । आहूय मह्यं प्रददौ मणि मुनिगणार्च्चितम् ।३०। प्रसेन नामक मेरा अनुज था । उसे एक सिंह ने मणि के लिए मार डाला । फिर वह सिंह भी उसी मणि के कारण जाम्बवान् के द्वारा वध को प्राप्त हुआ ।२६। उधर कलंक के भय से अमित तेज वाले भगवान् श्रीकृष्ण उस मणि की खोज करने लगे, तभी एक गिरि-गुहा में जाम्बवान् के साथ उनका घोर युद्ध हुआ ।२७। तभी जाम्बवान् अपने स्वामी को पहचान गया । भगवान् के चक्र से उसका शिर कट