भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

४६२ ] [ कल्किक पुराण कन्याएँ छाई हुई हैं। वह पुरी स्थान स्थान पर कल्पवृक्षो से सुशोभित हो रही है। वहाँ मनुष्य तो नाम को भी नही हैं। ५। विलोक्य कल्कि. प्रहसन्नाह भूपान्तिकमित्यहो । सर्पस्येयं पुरी रम्या नराया भयदायिनी । नागनारीगणार्कीर्णा कि यास्यमो वदन्त्विह ।६। इतिकर्त्तव्यताव्यग्रं रमानाथ हरिं प्रभुम् । भूपास्तदनुरूपाश्च खे वागाहाशरीरिणि ।७। विलोक्य नेमां सेनाभि प्रवेष्टु भोस्त्वमर्हसि । त्वां विनान्ये मरिष्यन्ति विषकन्यादृशादपि ।८। आकाशवाणीमाकर्ण्य कल्कि. शुकसहायकृत् । ययावेकः खड्गधरस्तुरगेण त्वरान्वित. ।६। गत्वा ता ददृशे वीरो धीरा धैर्यनाशिनीम् । रूपेणालक्ष्य लक्ष्मीशं प्राह प्रहसितानना ।१०। यह देख कर हँसते हुए कल्किजी ने राजाओ से कहा—हे राजन् यह सर्पपुरी कैसी आश्चर्यमयी एवं मनुष्यो के लिए अत्यन्त भयावनी है। इसमे नागकन्यो का ही निवास है। अब कहिए कि इसमे प्रवेश करें अथवा नही ? ।६। रमानाथ कल्किजी और सब राजागण भी यह निश्चय नही कर पाये कि क्या करना चाहिये, इसलिए अत्यन्त चिंतित हुये । तब आकाशवाणी सुनाई दी ।७। इस पुरी मे सेना-सहित प्रविष्ट नही होना चाहिए। क्योकि जैसे ही पुरी निवासिनी विष-कन्याओ की दृष्टि पड़ेगी, वैसे ही नष्ट हो जाओगे ।८। आकाशवाणी का निर्देश सुन कर कल्किजी एकाकी ही खड्ग लेकर घोड़े पर चढ़े और शुक को साथ लेकर चल दिये ।६। कुछ आगे जाने पर उन्हें एक अपूर्व कन्या दिखाई दी, जिसे देखते ही ज्ञानी जन भी धैर्य छोड देते हैं । वह कन्या अपूर्व रूप वाले कल्किजी को देख कर हँसती हुई बोली ।१०।