भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

चतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६३ ससारेऽस्मिन् नयनोर्वीक्षणक्षीणदेहा लोका भूपाः कति कति गता मृत्युमत्युग्रवीर्याः । साहं दीनासुरसुरन प्रेक्षण प्रेमहीना ते नेत्राब्जद्वयरससुधाप्लाविता त्वां नमामि । ११। क्वाहं विषेक्षणादीना क्वामृतेक्षणसङ्गमः । भवेऽस्मिन्भाग्यहीनायाः केनाहो तपसा कृतः । १२। कासि कन्यासि सुश्रोणि कस्मादेषा गतिस्तव । ब्रूहि मां कर्मणा केन विषनेत्र तवाभवत् । १३। चित्रग्रीवस्य भार्याहं गन्धर्वस्य महामते । सुलोचनेति विख्याता पत्युरत्यन्तकामदा ।१४। एकदाहं विमानेन पत्या पीठे न सङ्गता । गन्धमादनकुञ्जेषु रेमे कामकलाकुला ।१५। विषकन्या ने कहा — इस संसार मे अत्यन्त पराक्रमी अनेक राजागण तथा अन्यान्य मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। इस लिए मैं अत्यन्त दुःखित हूँ । देवता, दैत्य और मनुष्य किसी के साथ भी मेरा परिणय संभव नहीं है। मैं आपके अमृत के समान दृष्टि प्रवाह मे बहती हुई आपको नमस्कार कर रही हूँ ।११। मैं मन्द भाग्य वाली और विष-दृष्टि से युक्त हूँ और आपकी दृष्टि अमृतमयो है । मैं किस तपस्या के प्रभाव से आपका दर्शन प्राप्त कर सकी हूँ ।१२। कल्किजी ने कहा — हे सुश्रोणि ! तुम कौन एव किका कन्या हो ? तुम इस अवस्था को किस प्रकार प्राप्त हुई हो ? किस कर्म-दोष से तुम्हे यह विष दृष्टि मिली है । १३। विषकन्या ने कहा— हे महामते ! चित्रग्रीव नामक जो गन्धर्व हैं मैं उनकी पत्नी सुलोचना हूँ । मेरे द्वारा मेरे पति का मन अत्यन्त अनन्दित रहता था ।१४। एक समय की बात है — जब मैं अपने पति के साथ विमाना रूढ़ होकर गन्धमादन पर्वत के एक कुञ्ज मे शिला पर बैठ कर विहार-रत्त हो गई । १५। तत्र यक्षमूनिं दृष्ट्वा विकृताकारमातुरम् । १६। रूपयौवनगर्नेण कटाक्षेणाहसं मदात् । १६।