कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ ] [ कल्कि पुराण सोपालम्भ मुनिः श्रुत्वा वचन च ममाप्रियम् । शशाप मा क्रुधा तत्र तेनाह विषदर्शना ।१७। निक्षिप्ताह सर्पपुरे काञ्चन्या नागिनोगणे । पतिहोना दैवहीना चरामि विषवर्षिणी ।१८। न जाने केन तपसा भवद्दृष्टिपथ गता । त्यक्तशापामृताक्षाह पतलोक व्रजाम्यत ।१६। अहो तेषामस्तु शाप प्रसादो मा सतामिह । पत्यु. शापहृषेर्मोक्षात्तव पादाब्जदशनम् ।२०। उस समय मैं अपने रूप यौवन के गर्व से अत्यन्त मदोन्मत्त हो रही थी । वहाँ विकट शरीर वाले यक्षमुनि को देख कर मैं उन पर कटाक्ष करती हुई, उनकी हँसी उडाने लगी ।१६। मेरे मुख से अपने प्रति अपमानजनक वचन सुन कर मुनि क्रोधित हो उठे और उन्होने मुझे जो शाप दिया, उससे मैं तुरन्त विषदृष्टि को प्राप्त हो गई ।१७। तब मुझे इस कांचनीपुरी मे नागिनियो के मध्य डाल दिया गया । तभी से मेरी दृष्टि विष की वर्षा किया करती है । इस प्रकार मै अभागी पति से हीन होकर यहां एकाकी विचरती हूँ ।१८। मुझे ज्ञात नही कि अपनी किस तपस्या के फल से मैं आपकी दृष्टि के सामने आ गई हूँ। आपके दर्शन से मैं शाप-मुक्त होकर अमृतवर्षिणी दृष्टि से सम्पन्न हो गई हूँ । अब मैं अपने पति के पास गमन करती हूँ ।१६। अहा ! साधुओ के प्रसन्न होने की अपेक्षा त शाप देना भी श्रेष्ठ है क्योकि शाप के कारण ही तो मोक्ष स्वरूप आपके चरणाम्बुज का दर्शन प्राप्त हो सका है ।२०। ' इत्युक्त्वा सा ययौ स्वर्गं विमानेनार्कवर्चसा । कल्कितु तत्पुराधीश नृप चक्रे महामतिम् ।२१। अमर्षस्तत्सुतो धीमान् सहस्रो नाम तत्सुतः । सहस्रत सुतश्चसीद्राजा विश्रुतवानसि ।२२। बृहद्भानानां भूतानां संभूता यस्य वंशजा ।