भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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४७४ ] [ कल्कि पुराण वाद्यैर्नृत्यैश्च गीतैश्च पितृयज्ञमहोत्सवै १२। कल्कि कमलपत्राक्ष प्रहर्षं प्रददौ वसु । स्त्रीबालस्थविरादिभ्यः सर्वेभ्यश्च यथोचितम् ।१३। रम्भा तालधरा नन्दी हूहूगायति नृत्यति । दत्त्वा दानानि पात्रेभ्योब्राह्मणेय स ईश्वर. ।१४। उवास तीरे गगाया पितृवाक्यानुमोदित । सभाया विष्णुयशसः पूर्वराजकथा प्रिया ।१५। कथयन्तो हसन्तश्च हर्षयन्तो द्विजा बुधा । तत्रागतस्तुम्बुरुणानारद. सुरपूजित ।१६। यज्ञ का भले प्रकार परिपाक हुआ । अग्नि ने पाक किया, वरुण ने जल प्रदान किया और वायु परोसने लगा । पद्माक्ष कल्किजी ने इस प्रकार श्रेष्ठ अन्नादि, नृत्य, वाद्य, गीतादि से उत्सव करते हुए सब के आनन्द की वृद्धि की । बालक, स्त्री, वृद्ध आदि सब को धन से यथोचित सत्कृत किया ।११-१३। रम्भादि नाचने लगी, नन्दी ताल देने लगे, हुई गन्धर्व ने गीत गाया, उस समय ब्राह्मणो और सत्पात्रो को धन प्रदान करने के पश्चात् कल्किजी अपने पिता की अनुमति से गङ्गा- त पर रहने लगे । विष्णुयश की विद्वत्सभाव मे विद्वान् विप्रगण राजाओ को सन्तोष देने वाली कथाएं कहने लगे । इस प्रकार जब सभी ज्ञानी- जन एव द्विजजन आनन्द मे निमग्न थे, तभी राजा तुम्बरु ओर देवताओ द्वारा पूजित नारदजी वहाँ आये ।१४-१६ । तं पूजयामास मुदी पित्रा सह यथाविधि । तौ सपूज्य विष्णुयशा प्रोवाच विनयान्वितः । नारद वैष्णवं प्रीत्या वीणापाणि महामुनिम् ।१७। अहो भाग्यमहो भाग्य मम जन्मशताजितम् । भवद्विधाना पूर्णांनां यन्मे मोक्षाय दर्शनम् ।१८। अद्याग्नयश्च सुहुतास्तृप्ताश्च पितर. परम् ।