कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडश अध्याय-३ ] [ ४७५ देवाश्च परिसन्तुष्टास्तवावेक्षणपूजनात् ।१९। यत्पूजाया भवेत्पूज्यो विष्णुर्यन्मम दर्शनम् । पापसंघ स्पर्शनाच्च किमहो साधुसङ्गत ।२०। साधूना हृदय धर्मो वाचो देवा सनातनाः । कर्मक्षयाणि कर्माणि यतः साधुर्हरि. स्वयम् ।२१। उस अवसर पर प्रफुल्लित हृदय वाले विष्णुयश जी ने उन दोनो का विधिवत् पूजन किया और फिर उन्होने वीणापाणि विष्णु भक्त नारदजी से विनय पूर्वक कहा ।१७। विष्णुयश बोले—मेरा अहो- भाग्य है । सौ जन्मो से संचित पुन्य के प्रभाव से ही आप परम पूर्ण पुरुषो के दर्शन मेरे मोक्ष के उद्देश्य से ही प्राप्त हुए हैं ।१८। आपके दर्शन और पूजन के होने से हमारे पितरो की भी तृप्ति हो गई तथा अग्नि मे दी हुई आहुत के सफल होने से देवगण भी सन्तुष्ट हो गए हैं ।१९। जिनके पूजन मे भगवान् विष्णु का पूजन निहित है, उनके दर्शन मात्र से ही पुनर्जन्म का नाश हो जाता है । उनके स्पर्श मात्र से पापो के पुञ्ज भी समूल मिट जाते हैं । ऐसे साधुओ का सग भी अद्भुत ही है ।२०। साधुओ का हृदय धर्म, वाणी सनातनदेव और कर्म ही कर्म को क्षीण करते हैं । इस प्रकार साधु ही साक्षात् हरि हैं ।२१। मन्ये न भौतिको देहो वैष्णवस्य जगत्त्रये । यथावतारे कृष्णस्य सतो दुष्टयिविग्रहे ।२२। पृच्छामि त्वामतो ब्रह्मन्मायांसंसारवारिधौ । नौकाया विष्णुभक्त्या च कर्णधारोऽसि पारकृत् ।२३। केनाहं यातनागारान्निर्वाणपदमुत्तमम् । लप्स्यामीह जगद्बन्धो कर्मणा शर्म तद्वद ।२४। अहो बलवती माया सर्वाश्चर्यमयी शुभा पितर मातर विष्णुर्तैव मुञ्चति कर्हिचित् ।२५। पूर्णो नारायणो यस्य सुत. कल्किर्जगत्पतिः