कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७६ ] [ कल्कि पुराण
त विहाय विष्णुयशा मत्तो मुक्तिमभीप्सति ।२६। दुष्टो को दण्ड देने वाला श्रीकृष्णावतार जिस प्रकार भौतिक देह से युक्त नही है, वैसे ही तीनो लोको मे विष्णु भक्तो के शरीर भी पञ्चभूत से युक्त प्रतीत नही होते ।२२। हे ब्रह्मन् ! इस माया मय ससार सागर मे आप ही विष्णुभक्ति रूपिणी नौका के द्वारा पार कराने वाले हैं । इसी लिये मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ ।२३। हे विश्ववन्द्यो ! आप मुझे यह बताने की कृपा करिये कि मै इस ससार रूपी यातनागार से मुक्त होकर श्रेष्ठ निर्वाणपद को किस कर्म के द्वारा प्राप्त कर सकता हूँ ? ।२४, नारदजी ने कहा—अहो ! यह माया कैसी आश्चर्यमयी, उज्वला ओर बलवती है, जिसके प्रभाव से स्वय भगवान् भी अपने पिता माता को मुक्त नही करा पाते ।२५। जिन विष्णुयशजी के पुत्र साक्षात् भगवान् जगत्पति कल्कि हैं,वे मुझसे मोक्ष की कामना व्यक्त करतेहैं।२६। विविच्येत्थ ब्रह्मसुतः प्राह ब्रह्मयशः सुतम् । विविक्ते विष्णुयशस ब्रह्मसम्पद्विवर्द्धनम् ।२७। देहावसाने जीव सा दृष्ट्वा देहावम्बनम् । मायाऽह कर्तुं मिच्छन्त यन्मे तच्छृणु मोक्षदम् ।२८। विन्ध्याद्रौ रमणी भूत्वा मायोवाच यथेच्छया ।२ अह मोया मया त्यक्त कथजोवतुमिच्छसि ।३०। नाह जीवाम्यह माये कायेऽस्मिञ्जीवनाश्रये अहमित्यन्यथाबुद्धिर्विना देह कथ भवेत् ।३१। देहबन्धे यथाश्लेपास्तथ बुद्धि कथ तव । मायाधीनां विना चेष्टा ते कुतो वद ।३२। ब्रह्मसुवन नारदजी ने यह सोच कर ब्रह्मज्ञान देने के विचार से विष्णुयशजी से कहा ।२७। नारदजी बोले—जब देह के नष्ट होने पर पुनः देह का आश्रय प्राप्त करने की जीव ने कामना की तब माया ने जो कुछ कहा था, उसे सुनो ! इसके सुनने से ही मोक्ष मिल जाता है ।२८। उन भगवती माया ने विन्ध्याचल पर स्वेच्छा से नारी रूप धारण करके