कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडश अध्याय-३ ] [ ४७७ कहा ।२६। माया बोली- मै माया हूँ । जब मैने तुम्हारा त्याग कर दिया है, तब तुम पुनर्जीवन प्राप्त करने की इच्छा क्यो करते हो ? । ३०। इस पर जीव ने कहा- हे माये ! मैं तो जीवन की इच्छा नही करता, परन्तु जीवन का श्राश्रय शरीर ही है । मह रूपी अभिमान के बिना देह धारणा ही किस प्रकार सभव है ? ।३१। माया बोली देह धारण पर पर जो भेद ज्ञान होता है, तब तुम्हारी बुद्धि उस प्रकार की क्यो होती है ? जब चेष्टा माया के बिना सम्भव नही, तब माया रहित तुम्हारी चेष्टा किस प्रकार होती है ? ।३२। • मां विना प्राज्ञता माये प्रकाशविषयस्पृहा मायया जीवति मरश्चेष्टते हतचेतनः । निःसारः सारवद्भाति गजभुक्तकपित्थवत् ।३४। मम ससर्जजाता त्व नानानामस्वरूपिणी । मा विनिन्दसि कि मूढे स्वैरिणी स्वामिन यथा ।३५। ममाभावे तवाभाव प्रोद्यत्सूर्ये तमो यथा । मामावर्य विभासि त्व रविनवघनो यथा ।३६। लीलाबीजकुशूलासि मम माये जगन्मये : नाद्यन्ते मध्यतो भासि नानात्वादिन्द्रिजालवत् ।३७। जीव ने कहा- हे माये ! तुम्हारी प्राज्ञता मेरे बिना प्रकाशित नही हो सकती और न फिर विषय मे स्पृहा ही सम्भव है । ३३। माया बोली- जीव का जीवन धारण माया से ही हो सकता है । माया से रहित जीव हाथी द्वारा भक्षित कपित्थ फल के समान सारहीन होता है ।३४। जीव बोला- हे मूढ़े ! तूने हमारे ही ससर्ग से उत्पन्न होकर नाना प्रकार के नाम और रूप धारण कर लिये हैं । स्वामी की निन्दा करने वाली स्वैरिणी नारी के समान तू हमारी निन्दा क्यो कर रही है ? ।३५। जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार का अभाव हो जाता है, वैसे ही मेरे अभाव मे तेरा भी अभाव निहित है । जैसे सूर्य को आवृत्त करता