कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडश अध्याय-३ ] [ ४७६ कामनाओं से मुक्त हो जाओ ।४१। इस प्रकार विष्णुयश जी को ज्ञान देकर और कल्किजी की प्रदक्षिणा कर दोनों मुनीश्वरो ने कपिलाश्रम के लिए प्रस्थान किया ।४२। नारदेरितमाकर्ण्य कल्कि सुतमनुत्तमम् । नारायणं जगन्नाथं वन विष्णुयशा ययौ ।४३। गत्वा बदरिकारण्यं तपस्तप्त्वा सुदारुणम् । जीव बृहति सयोज्य पूर्णस्तत्याजय भौतिकम् ।४४। मृत स्वामिनमालिङ्गच सुमतिः स्नेहविक्लवा । विवेश दहन साध्वी सुवेशैर्दिवि संस्तुता ।४५।। कल्किः श्रुत्वा मुनिमुखात्पित्रोर्निर्वाणमीश्वरः । सवाष्पनयन स्नेहात्तयोः समकरोत्क्रियाम् ।।४६।। पद्मया रमया कल्किः शम्भले सुरवाञ्छिते । चकार राज्य धर्मात्मा लोकवेदपुरस्कृत ।४७। महेन्द्रशिखराप्रामस्तीर्थपर्यटनादृत. । प्रायात्कल्केर्दर्शनार्थ शम्भल तीर्थकृत् ।४८। विष्णुयशजी ने देवर्षि नारद के मुख से यह सुन कर और जान कर कि मेरे पुत्र ही भगवान् नारायण जगदीश्वर हैं, स्वयं वन के लिए प्रस्थान किया ।४३। वह वहाँ से चल कर बदरिकाश्रम पहुंचे और वहाँ घोर तप करके अपने आत्मा को ब्रह्म मे सयुक्त कर दिया तथा पच- भूतात्मक देह को छोड कर पूर्ण स्वरूप हो गए ।४४। अपने पति की मृत्यु हुई सुन कर सुमति स्नेह से विह्वल होकर अपने पति के साथ चिता में प्रविष्ट हो गई। उस समय श्रेष्ठ वस्त्र भूषण को धारण किये हुए देवलोक स्थित देवगण उनकी स्तुति करने लगे ।४५। कल्किजी ने मुनियो के मुख से अपने माता-पिता का महाप्रयाण सुन कर स्नेह-जल से परिपूर्ण नेत्रो के सहित उनका श्राद्धादि कर्म किया ।४६। फिर लोका चार और धर्माचार में स्थित कल्किजी देवताओ द्वारा कामना किये हुए शम्बल ग्राम मे रमा और पद्मा के सहित राज्य करने लगे ।४७। तीर्था-