कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ें४८० ] [ कल्कि-पुराण टन मे संलग्न परशुरामजी महैन्द्र पर्वत के शिखर से उतरते हुए कल्कि जी के दर्शनार्थ शम्भल ग्राम मे पधारे ।४८। तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय पद्मया रमया सह । कल्किः प्रहर्षो विधिवत्पूजाञ्चक्रे विधानवित् ।४९। नानारसैर्गुरामयैर्भोजयित्वा विचित्रिते । पर्यङ्केऽनकवस्त्राढ्ये शाययित्वा मुदं ययौ ५०। तं भुक्तवन्तं विश्रान्तं पादसंवाहनैर्गुरुम् । संतोष्य विनयापन्नं कल्किर्मधुरमब्रवीत् ।५१। तव प्रसादात्सिद्धं मे गुरौ त्रैवर्गिकञ्च यत् । शशिध्वजततायास्तु भृगु राम निवेदितम् ।५२। इति पतिवचनं निशम्य राम निजहृदयेप्सितपुत्रलाभामष्टम् । व्रतजपनियमैर्यमैश्च कैर्वा मम भवतीह मुदाह जामदग्न्यम् ५३ उन्हे देखते ही पद्मा और रमा के सहित कल्किजी अपने सिहं- सन से उठ पडे और विधि विधान सहित हर्षित मन से उनका पूजन करने लगे ।४६। विभिन्न रसो से युक्त अन्नादि का उन्हे भोजन कराके सुन्दर वस्त्रो से ढकी हुई अद्भुत शय्या पर उन्हे शयन कराया ।५०। जिस समय गुरुवर परशुरामजी विश्राम कर रहे थे, उसी समय कल्किजी उनके चरण दाबते हुए विनय पूर्वक मधुर वाणी से कहने लगे ।५१। हे गुरो ! आपकी कृपा से मेरे धर्म, अर्थ और काम-इन तीनो वर्ग की सिद्धि हो चुकी है । इस समय राजा शशिध्वज की पुत्री रमा आपसे एक निवेदन करना चाहती है, उसे सुनने की कृपा करे ।५२। पति के वचन सुन कर हर्षित हृदय से रमा ने परशुरामजी से प्रश्न किया—व्रत, जप, नियम आदि मे ऐसा कौन-सा अनुष्ठान है, जिसके द्वारा मुझे इच्छित् पुत्र की प्राप्ति हो सकती है ? ।५३। ●●●