कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश- सप्तदश अध्याय जामदग्न्यः समाकर्ण्य रमांत्ता पुत्रगद्धिजीम् । कल्केरभिमतं बुद्ध्वाकारयद्रुक्मिणीव्रतम् ।१। व्रतेन तेन च रमा पुत्राढ्या सुभगा सती । सर्वभोगेन सयुक्ता बभूव स्थिरयौवना ।२। विधान ब्रूहि मे सूत व्रतस्यास्य च यत्फलम् पुरा केन कृतं धर्म्यं रेक्मिणीव्रतमुत्तमम् ।३। शृणु ब्रह्मन् राजपत्री शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । अवगाह्य सरोनीर सोम हरमपश्यत ।४। सा सखोभिः परिवृता देवयान्या च सगता । शम्भुभीत्या समुत्थाय पर्यधुर्वासन द्रुतम् ।५। सूतजी बोले —हे ऋषियो ! रमा को पुत्र की अभिलाषिणी जान कर और कल्किजी के अभिप्राय को समझ कर परशुरामजी ने उसे रुक्मिणी व्रत का उपदेश किया ।१। उस व्रत के प्रभाव से शशिध्वज पुत्री रमा पुत्रवती, सौभाग्य सम्मन्ना, सर्व भोगों से परिपूर्ण एवं स्थिर यौवन हो गई ।२। शौनरुजी ने कहा —हे सूतजी ! उस रुक्मिणी व्रत का विधान और फल मुझे बताइये और साथ ही यह भी कहिये कि इस अत्यन्त उत्तम व्रत को पहिले किस ने किया था ? ।३। सूतजी ने कहा — हे ब्रह्मन् ! आपने जो पूछा है, वही कहता हूँ, सुनिये । दैत्यपति वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा थी । एक दिन वह सरोवर के जल मे घुल कर विहार रत हुई थी, तभी उसने पार्वती सहित भगवान् शंकर को वहाँ देखा ४८१