भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 229

४८२ ] [ कल्कि पुराण

।४। तब शर्मिष्ठा, देवयानी और अन्यान्य सखियां सभी भयभीत होकर सरोवर से निकल कर तट पर आ गई और अपने-अपने वस्त्रो को धारण करने लगी ।५। तत्र शुक्रस्य कन्याया वस्त्रवत्ययमात्मनः । सालक्ष्य कुपिता प्राह वसनं त्यज भिक्षुकि ।६। इति दानवकन्या सा दासीभि परिवारिता । तां तस्या वाससा बद्ध्वा कूपे क्षिप्त्वा गता गृहम् ।७। ता मग्ना रुदती कूपे जलार्थी नहुषात्मजः । करे स्पृश्य समुद्धृत्य प्राह का त्व वरानने ।८। सा शुक्रपुत्री वसनं परिधाय ह्रिया भिया । शर्मिष्ठायाः कृतं सर्वं प्राह राजानमीक्षती ।६। ययातिस्तदभिप्रायं ज्ञात्वानुव्रज्य शोभनम् । आश्वास्य तां ययो गेहं तस्याः परिणायाहतः ।१०। तभी शीघ्रता और विह्वलता के कारण दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी ने भूल से शर्मिष्ठा के वस्त्र धारण कर लिये । यह देख कर शर्मिष्ठा क्रोधित होकर बोली—अरी भिक्षुकी ! तू मेरे वस्त्रो को उतार दे ।३। इसके पश्चात उस दैत्यराज पुत्री शर्मिष्ठा ने देवयानी को वस्त्रो से बाँध कर एक कुए मे डाल दिया और दासियो के सहित घर चली गई ।७। कूप मे गिरी हुई देवानी रुदन करने लगी, तभी नहुष- पुत्र राजा ययाति जल पीनेकी इच्छासे उस कूप पर पहुँचे । उन्होंने देव- यानी का हाथ पकड कर कूपसे निकाला और बोले-हे वरानने ! तुम कौन हो-यह बताओ ।८। शुक्रपुत्री देवयानी ने राजा की ओर लज्जा और भय से देखते हुए शीघ्रता पूर्वक वस्त्र पहिने और शर्मिष्ठा ने जो कुछ किया था वह सब उन्हे कह सुनाया ।६। देवयानी के अभिप्राय को जान कर राजा ययाति ने उसका पाणिग्रहण करने की अभिलाषा प्रकट की और फिर कुछ दूर तक उसके साथ-साथ चलते हुए, उसे हर प्रकारका आश्वा- सन देकर अपने घर को चले गये ।१०!