भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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४८८ ] [ कल्कि पुराण बुभुजे पृथिवी सर्वामपूर्वा स्वजनेवृंता । सा पुत्रौमुषुवे साध्वी मेघमालबलाहकौ ।४४। देवानामुपकर्त्तारौ यज्ञदानतपोव्रतैः । महोत्साहौ महावीर्यौ सुभगौ कल्किसम्मतौ ।४५। व्रतवरमिति कृत्वा सर्वसम्पत्समुद्ध्या भवति विदि- तनत्त्वा पूजिता पूर्ण कामा । हरिचरणसरोजद्वन्द्वभ- क्त्यैकताना व्रजति गतिमपूर्वां ब्रह्मविज्ञैरगम्याम् ।४६। वृहदश्व की प्रेरणा से द्रौपदी ने इस व्रत को किया था और वह भी दु ख से मुक्त होती हुई पतिमुक्त और स्थिर यौवना हो गई ।४१। इसके पश्चात् रमा ने परशुरामजी के निर्देशन मे वैशाख शुक्ला द्वादशी के दिन इस रुक्मिणी व्रत का अनुष्ठान प्रारम्भ किया और चार बर्ष व्यतीत होने पर उसका समापन किया ।४१। रेशमी सूत्र हाथ मे बाँधते हुये रमाने ब्राह्मणी को भोजन कराया और क्षीरयुक्त श्रेष्ठ हविष्यान्न का अपने स्वामी सहित आहार किया । इससे वह स्वजनो से परिपूर्ण होकर पृथिवी का अखण्ड सुख भोगने लगी । उनके मेघमाल और बलाहक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए ।४४। वे दोनो देवताओ के उपकारी, यज्ञ-दान और तपोव्रत मे निरत रहने वाले, अत्यत उत्साही, महापराक्रमी सौभा- ग्यवान् तथा कल्किजी की आज्ञा में चलने वाले थे ।४५। इस व्रत को करने वालो को सब प्रकार सुख, सम्पत्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है । उनकी सब कामनाएं पूर्ण होती हैं । ब्रह्मज्ञान और हरिचरणो में प्रीति उत्पन्न होती है, तथा वे श्रेष्ठ गति को प्राप्त होते हैं ।४६।

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