कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश अध्याय-३ ] [ ४८७ इति तासां व्रत दृष्ट्वा मुनि नत्वा सुदुःखिता । शर्मिष्ठा मिष्टवचना कृताञ्जलिरुवाच ताः ।३६। राजपुत्री दुर्भगा मां स्वामिना परिवर्जिताम् त्रातुमर्हथ हे देव्यो व्रतेनानेन कर्मणा ।३७। श्रुत्वा तु ता वचस्तस्याः कारुण्याञ्च कियत्कियत् । पूजोपकरणं दत्त्वा कारयामासुरादरात् ।३८। व्रत कृत्वा तु शर्मिष्ठा लब्ध्वा स्वामिनमीश्वरम् । सूत्वा पुत्रान्सुसन्तुष्टा समभूत्स्थिरयौवना ।३६। सीता चाशोकवनिकामध्ये सरमया सह। व्रत कृत्वा पति लेभेरामं राक्षसनाशनम् ।४०। स्त्रियो को इस प्रकार व्रत करते हुए देख कर शर्मिष्ठा ने मुनि को प्रणाम किया और हाथ जोड कर बोली ।३६। शर्मिष्ठा ने कहा—हे देवियो ! मैं अत्यन्त अभागी राज पुत्री हूँ । भाग्य के दोष से ही पति संग- हीना हूँ । यह व्रत किस प्रकार किया जाता है, मुझे यह बता कर मेरी रक्षा करिये ।३७। शर्मिष्ठा के वचन सुन कर उन स्त्रियो को दया आ गई और उन्होंने कुछ पूजन सामग्री उसे देकर उससे आदर पूर्वक व्रत कराया ।३८। इस व्रत को करके शर्मिष्ठा भी अपने प्रिय पति को प्राप्त होकर पुत्रवती और स्थिर यौवना होकर संतुष्ट हो गई ।३६। सीता और सरमा ने भी अशोक वाटिका मे इस व्रत का अनुष्ठान किया था उसी के पुण्य-फल से सीताजी राक्षस-संहारक भगवान् राम से मिल सकी थी ।४०। वृहदश्वप्रसादेन कृतवेमं द्रौपदी व्रतम् । पतियुक्ता दुखमुक्ता बभूव स्थिर यौवना ।४१। तथा रमा सिते पक्षे वैशाखे द्वादशोदिने । जामदग्न्याद्व्रतं चक्रे पूर्णं वर्षचतुष्टयम् ।४२। पट्टसूत्रं करे बद्ध्वा भोजयित्व द्विजान्ब । भुक्त्वा हविष्यं क्षीराक्तं सुमृष्टं स्वामिना सह ।४३।