भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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४८६ ] [ कल्क पुराण

हुई है इसके द्वारा आपके वक्षस्थल की शोभावृद्धि होगी । इस श्रेष्ठ माला को आप ग्रहण कीजिये ।२८। हे हरे ! आपको आवृत्त करने मे कोई भी समर्थ नही है । आप अपनी प्रिया लक्ष्मी जी के सहित इस सूत्र- सथान द्वारा निर्मित शुद्ध वस्त्रावरण को स्वीकार कीजिये ।२६। हे देव ! यह सूत्र प्रजापति द्वारा निर्मित हुआ है इसे आप अपनी पत्नी रुक्मिणीजी के सहित ग्रहण कीजिये ३०। नानारत्नसमायुक्त स्वर्णमुक्ताविघट्टितम् प्रियया सह देवेश गृहाणाभरण मम ।३१। दधिक्षीरगुडान्नादिपूपलड्डुकखण्डकान् । गृहाण रुक्मिणीनाथ सनाथ कुरु मा प्रभो ।३२। कर्पूरागुरुगन्धाढ्य परमानन्ददायकम् । धूप गृहाण वरद वैदर्भ्या प्रियया सह ।३३। भक्ताना गेहशक्ताना ससारध्वान्तानाशनम् । दीपमालोकय विभो ! जगदालोकनादर ।३४। श्यामसुन्दर ! पद्माक्ष ! पीताम्बर ! चतुर्भुज ! । प्रपन्न पाहि देवेश रुक्मिण्या सहिताच्युत ।३५। हे देवेश ! हे प्रभो ! विभिन्न प्रकार के रत्नो से युक्त एव स्वर्ण द्वारा निर्मित इन आभूषणो को आप अपनी प्रिया लक्ष्मीजी के सहित ग्रहण कीजिये ।३१। हे रुक्मिणीनाथ ! यह दधि,दुग्ध,गुड, अन्न, पुआ लड्ढू एव शर्करादि को ग्रहण करके मुझे सनाथ कीजिये ।३२। हे वरद ! परमानन्द के देने वाली इस कर्पूर और अगर युक्त गन्ध को आप अपनी प्रिया के सहित स्वीकार कीजिये ।३३। हे विभो ! आप सस-कामी भक्तो के अन्धकार को नष्ट करने वाले हैं और आदर सहित जगत् को अपने प्रकाश से आलोकित कर रहे हैं, इस दीपक का अवलोकन कीजिये ।३४। हे श्यामसुन्दर ! हे कमलाक्ष ! हे पीताम्बरधारी चतुर्भुज ! हे देवेश ! आप रुक्मिणीजी के सहित प्रसन्न होते हुए हमारी रक्षा कीजिये ।३५।