भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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४६६ ] [ कल्कि पुराण प्रकाशीकृताशेषलोकत्रयात्र वक्षः स्थले भास्वतकौस्तु श्याम मेघौघराजच्छरीरद्विजाधीशतुङ्गानन त्राहि विष्णो स दाराः वय त्वा प्रसन्ना सशेष ।११। यद्यस्त्यनुगृहोऽस्याक व्रज वैकुण्ठमीश्वर । त्यक्त्वाशासितभूखण्ड सत्यधर्माविरोधत ।१२। कल्किस्तेषामिति वचः श्रुत्वा परमहर्षितः । पात्रात्रैः परिवृतश्चकार गमने मतिम् ।१३। पुत्रानाहूय चतुरो महाबलपराक्रमान् । राज्ये निक्षिप्य सहसा धर्मिष्ठाप्रकृतिप्रियान् ।१४। ततः प्रजाः ममाहूय कथयित्व निजः कथाः । प्राह तान्त्रिजनिर्याण देवानामुपरोधत. ।१५। हे प्रभो ! आपके श्याम वर्ण वाले वक्षस्थल मे अत्यन्त ज्योति सम्पन्ना कौस्तुभमाणी सुशोभित है । उस मणि के रश्मिजाल से तीनो लोक प्रकाशित हो रहे है इससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे मेघमाल के मध्य पूर्ण चन्द्र प्रतिष्ठित हो । हे नाथ ! हम सब विपत्ति मे पड़े हुए हैं और अपने नारी, पुत्र, स्वजनादि के सहित आपकी शरण में आते हैं । हे प्रभो ! हम पर प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिये ।११। हे नाथ ! अब यह पृथ्वी सत्य और धर्म से अविरोध पूर्वक शासित है । यदि आपकी हम पर कृपा है तो अब इसे त्याग कर वैकुण्ठ के लिए प्रस्थान कीजिये ।१२। देवाताओं के इन वचनों को सुन कर कल्किजी अत्यत प्रसन्न हुए और वे अपने नृपात्र मित्रो के सहित वैकुण्ठ गमन की इच्छा करने लगे ।१३। तब उन्होंने प्रजा वत्सल, महाबली एवं धार्मिक अपने चारो पुत्रो को बुला कर तुरन्त ही राज्याभिषेक कर दिया ।१४। फिर उन्होंने सम्पूर्ण प्रजा को बुला कर अपना वृत्तान्त कहते हुए उसे सूचित कर दिया कि अब हमे देवताओ के अनुरोध पर वैकुण्ठ धाम के लिए जाना है ।१५।