कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऊनविंश अध्याय-३ ] [ ४६५ कुण्डलो से सुशोभित है उनका मुखारविन्द मधुर मुसकान और हर्षालाप से अत्यत शोभा को प्राप्त हो रहा है ॥५॥ कृपाकटाक्षविक्षेपपरिक्षिप्तविपक्षकम् । तारहारोल्लसद्वक्षश्चन्द्रकान्तमणिश्रिया ॥६॥ कुमुद्वतीमोदवह स्फुरच्छक्रायुधाम्बरम् । सर्वदानन्दसन्दोहरसोल्लसितविग्रहम् ॥७॥ नानामणिगणद्योतदीपित रूपमद्भुतम् । ददृशुर्देवगन्धर्वा ये चान्ये समुपागता ॥८॥ भक्त्या परमया युक्ता. परमानन्दविग्रहम् । कल्कि कमलपत्राक्ष तुष्टुवुः परमादरात् ॥६॥ जयाशेषसक्लेशकक्षप्रकीर्णानलोद्दाममकीर्णहीश देवेश विश्वेश भूतेश भावः । त्ववानन्त चान्त-स्थितोऽङ्गाप्तरत्न प्रभाभातपादाजितानन्तशक्ते ॥१०। शत्रु भी उनके कृपा-कटाक्ष-विक्षेप से अनुग्रह को प्राप्त होते हैं । वक्षस्थल पर चन्द्रकान्त मणि की कुमुदिनी को प्रसन्न करने वाली ज्योति से सयुक्त हार सुशोभित है, वस्त्र इन्द्र-धनुष के समान विविध रंगो में शोभा को बढा रहे हैं । आनन्द रस के कारण हृदय उल्लसित हो रहा है ।६-७। देवता गंधर्वादि सभी आगन्तुकोको कल्किजी का अनेक मणियो से सशोभित एव तेजस्वी रूप इस प्रकार अत्यत अद्भुत दिखाई दिया ।८। तब वे सभी परम भक्ति भाव से आदर पूर्वक उन परमानन्द विग्रह कमल लोचन कल्किजी की स्तुति करने लगे ।६। देवताओ ने कहा—हे देवेश ! हे विश्वेश्वर ! हे भूतेश्वर ! हे प्रभो ! आप सभी भावो से युक्त एव अनन्त हैं । आपके प्रचण्ड अग्नि रूप के किंचित् स्पर्श से भी इस ससार भर के क्लेश-पुंज भस्म हो जाते हैं । कान्ति की राशि से सम्पन्न आपके चरणो से लोक प्रकाशित है । हे अनन्तशक्ते ! आपकी जय •हो ।१०।