कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश— ऊनविंश अध्याय ततो देवगणा सर्वे ब्रह्मणा सहिता रथैः । स्वैः स्वैर्गणैः परिवृता कल्कि द्रष्टुमुपाययुः ॥१॥ महर्षयः सगन्धर्वा किन्नराश्चाप्सरोगणा । समाजग्मुः प्रमुदिताः शम्भल सुरपूजितम् ॥२॥ तत्र गत्वा सभामध्ये कल्किं कमललोचनम् । तेजोनिधि प्रपन्नाना जनानामभयप्रदम् ॥३॥ नीलजीमूतसंकाश दीर्घपीवरबाहुकम् । किरीटेनार्कवर्मेन स्थिरविद्युन्निभेन तम् ॥४॥ शोभमान द्युमणिना कुण्डलेनाभिशोभिना । सहर्षालापविकसद्वदन स्मितशोभिनम् ॥५॥ सूतजी बोले—इसके अनन्तर एक समय सब देवता और ब्रह्मा सयुक्त होकर अपने अपने गणो के सहित रथो पर चढ कर कल्किजी के दर्शनार्थ आये ॥१॥ महर्षिगण, गधर्वगण, किन्नरगण तथा अप्सरागण सभी अत्यंत मुदित हृदय से उस सुरपूजित शभल ग्राम मे एकत्र हुए ॥२॥ फिर सब कल्किजी की सभा में गये और वहाँ पहुँच कर उन्होने देखा कि कमललोचन भगवान् कल्किजी शरणागतो को अभयदाता रूप से विराज- मान हैं ॥३॥ उनकी कान्ति नील मेघ समान थी, दीर्घ और सुपुष्ट भुजाएँ हैं, उनका मस्तक स्थिर विद्युत् अथवा सूर्य के समान तेजोमय किरीट से सुशोभित है ॥४॥ उनका मुख मंडल सूर्य के समान प्रकाश करने वाले ४६४