भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

[Header] ऊनविंश-अध्याय-३ ] [ ४६६

अन्ये नृपतयो ये च कल्केर्विरहकर्शिताः । तद्ध्यायन्तो जजन्तश्च विरक्ताः स्युर्नृपासने ।३०। इति कल्केरननस्तस्य कथां भुवनपावनीम् । कथयित्वा शुकः प्रायान्नरनारायणाश्रमम् ।३१। मार्कण्डेयादयो ये च मुनयः प्रशमायनाः । श्रुत्वानुभावं कल्केस्ते तं ध्यायन्तो जगुर्यशः ।३२

भगवान् कल्किजी की आज्ञा के अनुसार धर्म और सत्युग भार्या- विहीन रह कर सुख पूर्वक भूमडल पर चिरकाल तक विचरण करते रहे ।२७ देवापि और मरु-यह दोनो राजा कल्किजी के आदेशा- नुसार प्रजा-पालन एव पृथिवी के रक्षण में तत्पर हुए ।२८। भगवान् कल्किजी का गमन सुन कर विशालयूप नरेश भी अपने पुत्र को राज्य देकर वन मे चले गये ।२६। अन्यान्य राजागण भी कल्किजी के वियोग को सहन न कर सके । उन्होने अपने-अपने राज्य का त्याग कर दिया और कल्किएजी के रूप का ध्यान करते हुए उन्ही का नाम जपते लगे ।३०। अनन्त प्रभु कल्किजी की इस लोक पावनि कथा का वर्णन करने के पश्चात शुकदेवजी ने नर-नारायण को प्रस्थान किया ।३१। शान्त चित्त वाले मार्कण्डेय आदि मुनिगण भगवान् कल्किजी के इस महा- त्म्य को श्रवण कर उनका ध्यान करते हुए यशोगान मे तत्पर हुए ।३२।

यस्यानुशासनाद्भूभौ नार्धामुष्ठाप्रजाजनाः । नाल्पायुषो दरिद्राश्च न पाखण्डा न हेतुकाः ।३३ नाधयो व्याधयः क्लेशा दैवभूतात्मसम्भवाः । निर्मत्सराः सदानन्दा बभूवुर्जीवजातयः ।३४। इत्येतत्कथितं कल्केरवतार महोदयम् । धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं परम् ।३५। शोकसन्तापपापघ्नं कलिव्याकुलनाशनम् । सुखदं मोक्षदं लोके वाञ्छितार्थफलप्रदम् ।३६।

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