भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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५०० ] [ कलिक पुराण

तावच्छास्त्रप्रदीपाना प्रकाशो भुवि रोचते । भाति भानु पुराणाख्यो यावल्लोकेऽति कामधुक् । ३७। श्रुत्वैतद्भृगुवंशजो मुनिगणैः साक सहर्षो वशी ज्ञात्वा सूतममेषबोधविदितं श्रीलोमहर्षात्मजम् । श्रीकल्केरवतारवाक्यममलं भक्तिप्रदे श्रीहरेः शुश्रूषु पुनराह साधुवचसा गंगास्तवं सत्कृत । ३८। जिनके शासनकाल मे इस पृथिवी पर कोई भी धर्म-हीन अल्पायुष्य, दरिद्री, पाखण्डी तथा कपट पूर्ण आचरण वाला व्यक्ति नही रहा और सभी प्राणी आधि-व्याधि से रहित, क्लेश-रहित और मात्सर्य- रहित होकर देवताओ के समान सुखी हो गए, उन्ही के अवतरण का का यह प्रसग कहा गया है। इसके श्रवण मात्र मे धन, यश और आयु की वृद्धि होती और परमानन्द की प्राप्ति होती है तथा अन्तकाल मे स्वर्ग की उपलब्धि हो जाती है । ३३-३५। यह कथा सुनने से शोक, सन्ताप और पाप को नष्ट करती है। कलियुग के उद्वेगो का शमन मोक्ष एव वाञ्छित फल देने मे वह समर्थ हैं । ३६। इच्छित फल को दाता पुराण रूपी सूर्य को उदय जब तक ससार मे नही होता, तभी तक अन्यान्य-शास्त्र दीपक माला का प्रकाश टिक पाता है । ३७। भृगुवश मे उत्पन्न मुनिगण शौनकादि ऋषियो ने इस भक्ति रस से परिपूर्ण कल्कि कथा के श्रवण से अत्यन्त आनन्द प्राप्त किया । वे जान गये कि लोम- हर्षंण के पुत्र सूतजी ज्ञान में इस प्रकार प्रवृत्त हैं । मुनियो के हृदय मे हरि कथा सुनने की इच्छा पुनः जागृत हुई और उन्होने आदर सहित गगास्तोत्र के विषय मे सूतजी से प्रश्न किया । ३८।