भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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तृतीयांश— विंश अध्याय हे सूत ! सर्वधर्मज्ञ यत्वया कथितं पुरा । गङ्गां स्तुत्वा समायाता मुनयः कल्कि सन्निधिम्‌ ।१। स्तवं तं वद गङ्गायाः सर्वपापप्रणाशनम्‌ । मोक्षदं शुभदं भक्त्या शृण्वतां पठता मिह ।२। शृणुध्वमृषयः सर्वे गङ्गास्तव मनूत्तमम्‌ । शोकमोहरं पुंसामृषिभिः परिकीर्त्तितम्‌ ।६। इयं सुरतरगिणी भवनवारिधेस्तारिणी । स्तुता हरिपदाम्बुजादुपगता जगत्संसदः । सुमेरुशिखरामरप्रियजला मलक्षालनी । प्रसन्नवदना शुभा भवभयस्य विद्राविणी ।४। भगीरथमथानुगा मुरकरीन्द्रदर्पापहा महेशमुकुटप्रभा गिरिशिरः पताकासिता । सुरासुरनरोरगैर्जभवाच्छुतैः स स्तुता विमुक्तिफलशालिनी कलुषनाशिनी राजते ।५। शौनकजी बोले— हे सूतजी ! आप सभी धर्मों के जानने वाले हैं। आपने कहा था कि मुनिगण गङ्ग जी का स्तवन करके कल्किजी के पास पहुँचे थे, तो वह स्तव कौन-सा है, जिसके भक्ति-सहित पढ़ने या सुनने से मोक्ष रूपी मङ्गल की प्राप्ति होती हैं और सभी पापों का नाश होता है । उसे हमारे प्रति कहिये ।१-२। है सूतजी ने कहा— हे मुनियो ! उस ५०१