कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश-अध्याय-३ ] [ ५०२ और मोह के नाशक अत्यंत श्रेष्ठ ऋषि प्रणीत गंगा-स्तोत्र को आपके प्रति कहता हूँ, सुनिये।३। ऋषियों ने कहा - यह सुरतरंगिणी संसार समुद्र से पार करने वाली भगवान् विष्णु के चरणारविन्दो से उद्भुत होकर भूमण्डल पर प्रवाहित हुई । यह भवभय विनाशिनी, पाप नाशिनी, सुमेरु शिखर वासिनी, अमृत जल वाली, प्रसन्नवदना भगवती गंगाजी शुभप्रदायिनी एवं सर्व पूजिता है ।४ यह भगवती राजा भगीरथ के पीछे-पीछे पृथिवी पर चली । इन्होने ऐरावत का गर्व खंडन किया । यह शिवजी के मस्तक मे मुकुट की प्रभा रूप से शोभामयी और हिमा- लय की श्वेत पताका के समान हैं । सभी देवता, दैत्य, मनुष्य और नाग आदि इनके यश का सदा गान करते रहते हैं । यह पापनाशिनी एवं मोक्षदायिनी हैं ।५। पितामहकमण्डलुप्रभवमुक्तिबीजालता श्रुतिस्मृतिगणस्तुता द्विजकुलालवालावृता । सुमेरुशिखराभिदा निपतिता त्रिलोकावृता । सुधर्मफलशालिनी सुखपलाशिनी राजते ।६। वरद्विहगमालिनी सगरवंशमुक्तिप्रदा · मुनीद्रवरनन्दिनी दिवि मता च मन्दाकिनी । सदा दुरितनाशिनी विमलवारिसदर्शन- प्रणामगुणकीर्त्तनादिषु जगत्सु संराजते ।७। महाभिधसुताङ्गना हिमगिरीशकूटस्तनी सफेनजलहासिनी सितमरालसचारिणी । चलल्लहरिसत्करा वरसरोजमालाधरा रसोलसितगामिनी जलधिकामिनी राजते ।८। इस मुक्ति रूपी बीजलताका प्रादुर्भाव ब्रह्म जी के कमण्डलुमे हुआ है । द्विजगण इसके आल-वाल रूप और सुधर्म इसको फल है । यह सुख रूप किसलयो से परिपूर्ण लता सुमेरु पर्वत का भेदन करके प्रगट हो गई । तीनो लोको मे व्याप्त गंगाजी का यह स्तोत्र श्रुति, स्मृति