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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

तृतीयांश— विंश अध्याय हे सूत ! सर्वधर्मज्ञ यत्वया कथितं पुरा । गङ्गां स्तुत्वा समायाता मुनयः कल्कि सन्निधिम्‌ ।१। स्तवं तं वद गङ्गायाः सर्वपापप्रणाशनम्‌ । मोक्षदं शुभदं भक्त्या शृण्वतां पठता मिह ।२। शृणुध्वमृषयः सर्वे गङ्गास्तव मनूत्तमम्‌ । शोकमोहरं पुंसामृषिभिः परिकीर्त्तितम्‌ ।६। इयं सुरतरगिणी भवनवारिधेस्तारिणी । स्तुता हरिपदाम्बुजादुपगता जगत्संसदः । सुमेरुशिखरामरप्रियजला मलक्षालनी । प्रसन्नवदना शुभा भवभयस्य विद्राविणी ।४। भगीरथमथानुगा मुरकरीन्द्रदर्पापहा महेशमुकुटप्रभा गिरिशिरः पताकासिता । सुरासुरनरोरगैर्जभवाच्छुतैः स स्तुता विमुक्तिफलशालिनी कलुषनाशिनी राजते ।५। शौनकजी बोले— हे सूतजी ! आप सभी धर्मों के जानने वाले हैं। आपने कहा था कि मुनिगण गङ्ग जी का स्तवन करके कल्किजी के पास पहुँचे थे, तो वह स्तव कौन-सा है, जिसके भक्ति-सहित पढ़ने या सुनने से मोक्ष रूपी मङ्गल की प्राप्ति होती हैं और सभी पापों का नाश होता है । उसे हमारे प्रति कहिये ।१-२। है सूतजी ने कहा— हे मुनियो ! उस ५०१

विश-अध्याय-३ ] [ ५०२ और मोह के नाशक अत्यंत श्रेष्ठ ऋषि प्रणीत गंगा-स्तोत्र को आपके प्रति कहता हूँ, सुनिये।३। ऋषियों ने कहा - यह सुरतरंगिणी संसार समुद्र से पार करने वाली भगवान् विष्णु के चरणारविन्दो से उद्भुत होकर भूमण्डल पर प्रवाहित हुई । यह भवभय विनाशिनी, पाप नाशिनी, सुमेरु शिखर वासिनी, अमृत जल वाली, प्रसन्नवदना भगवती गंगाजी शुभप्रदायिनी एवं सर्व पूजिता है ।४ यह भगवती राजा भगीरथ के पीछे-पीछे पृथिवी पर चली । इन्होने ऐरावत का गर्व खंडन किया । यह शिवजी के मस्तक मे मुकुट की प्रभा रूप से शोभामयी और हिमा- लय की श्वेत पताका के समान हैं । सभी देवता, दैत्य, मनुष्य और नाग आदि इनके यश का सदा गान करते रहते हैं । यह पापनाशिनी एवं मोक्षदायिनी हैं ।५। पितामहकमण्डलुप्रभवमुक्तिबीजालता श्रुतिस्मृतिगणस्तुता द्विजकुलालवालावृता । सुमेरुशिखराभिदा निपतिता त्रिलोकावृता । सुधर्मफलशालिनी सुखपलाशिनी राजते ।६। वरद्विहगमालिनी सगरवंशमुक्तिप्रदा · मुनीद्रवरनन्दिनी दिवि मता च मन्दाकिनी । सदा दुरितनाशिनी विमलवारिसदर्शन- प्रणामगुणकीर्त्तनादिषु जगत्सु संराजते ।७। महाभिधसुताङ्गना हिमगिरीशकूटस्तनी सफेनजलहासिनी सितमरालसचारिणी । चलल्लहरिसत्करा वरसरोजमालाधरा रसोलसितगामिनी जलधिकामिनी राजते ।८। इस मुक्ति रूपी बीजलताका प्रादुर्भाव ब्रह्म जी के कमण्डलुमे हुआ है । द्विजगण इसके आल-वाल रूप और सुधर्म इसको फल है । यह सुख रूप किसलयो से परिपूर्ण लता सुमेरु पर्वत का भेदन करके प्रगट हो गई । तीनो लोको मे व्याप्त गंगाजी का यह स्तोत्र श्रुति, स्मृति

५०३ ] [ कल्कि-पुराण

आदि सभी धर्म शास्त्रो से सम्मत है ।६। सगरवश को मोक्ष देने वाली यह जान्हवी, देवताओ के लिए मन्दाकिनी स्वरूपा तथा सदैव मगल के देने वाली है । प्रणाम पूर्वक इनका गुणगान करने और इनके निर्मल जल का दर्शन करने से ही संसार मे सुख की प्राप्ति होती है ।७। हिम- लय के शिखर रूपी वक्ष वाली यह भगवती महाराज शान्तनु की रानी हुई थी । इनका फेनो से युक्त जल ही हास है तथा श्वेत वर्ण वाले हम जिनकी गति, खिले हुए कमलोकीपंक्ति जिनकी माला तथा तरगही जिनके हाथ हैं, ऐसी रसवती वह गंगा प्रमुदित गति से समुद्र से मिलने के लिए बढी चली जा रही है ।८। क्वचित्कलकलस्वना क्वचिदधीरयादोगणा- क्वचिन्मुनिगणै स्तुता क्वचिदनन्तसपूजिता । क्वचिद्रविकरोज्ज्वला क्वचिदुदग्रपाताकुला क्वविज्जनविगाहिता जयति भीष्ममातासती ।६। स एव कुशलो जन प्रणमतीह भागीरथी स एव तपसा निधिर्जपति जाह्नवीमादरात् । स० एव पुरुषोत्तमः स्मरति साधु मन्दाकिनी स एव विजयी प्रभुः सुरतरगिणी सेवते ।१०। तवामल जलातित खगशृगालमीनक्षत चलल्लहरि लोलित रुचिर तीर जम्बालितम् । कदानिजवपुर्मुदा सुरनरोरगै सस्तुतोऽ- प्यह त्रिपथगामिनि ! प्रियमतीव पश्याम्यदौ ।११। जिनकी कही मुनिगण स्तुति करते हैं, तो कही अनन्त भगवान् द्वारा पूजी जाती है । जिनके जल मे कही विकराल जीव विचर रहे हैं, कही जिनका जल कल कल-गान कर रहा है, वही जल कही भीषण नाद करता हुआ पतित हो रहा है, उस पर कही सूर्य रश्मियाँ पड कर उसे प्रकाशमय कर रही हैं और कही उस जल मे मनुष्य स्नान कर रहे हैं । ऐसी इन भीष्म की माता सती गंगाजी की जय हो ।६। इन भगवती

त्रिंश-अध्याय-३ ] [ ५०४ गंगा को प्रणाम करने वाले पुरुष कुशल हैं। इनके नाम का जप करने वाले मनुष्य ही वास्तव में तपस्वी हैं। इनका स्मरण करने वाले प्राणी ही श्रेष्ठ हैं। इनकी उपासना करने वाले जीव ही सब को जीतने में समर्थ तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के स्वामी हैं। १०। हे देवि ! हे त्रिपथगे ! आपके निर्मल जल मे हमारा शरीर कब भासित होगा ? इस देह के मृत होने पर पक्षी और शृगाल आदि कब इसे नोचेंगे और फिर कब यह आपकी चंचल तरंगों में उछलता हुआ तट पर स्थित शिवारों से कब सजेगा ? हे माता ! मैं स्वर्ग लोक को कब प्राप्त कर सकूँगा और सुर, नर नाग कब मेरा स्तव करेंगे ? इस प्रकार का अपना सौभाग्य मैं कब देख सकूँगा ? ११। त्वत्तीरे वसतिं तवामलजलस्नानं तव प्रेक्षणं त्वन्नामस्मरणं तवोदयकथासंलापनं पावनम् । गंगे मे तव सेवनैकनिपुणोऽप्यानन्दितश्चाहतं स्तुत्वा त्वद्गतपातको भुवि कदा शान्तश्चरिष्याम्यहम् । १२। इत्येतन्नृपिशि प्रोक्तं गङ्गास्तवमनुत्तमम् । स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं पठनाच्छ्रवणादपि । १३। सर्वपापहरं पुंसां बलमायुविवर्द्धनम् । प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने गङ्गासान्निध्यतो भवेत् । १४। इत्येतद्भागर्वाख्यानं शुकदेवान्मया श्रुतम् । पठितं श्रावितं चात्र पुण्यं धन्यं यशस्करम् । १५। अवतारं महाविष्णोः कल्केः परममद्भुतम् । पठतां शृण्वतां भक्त्या सर्वाशुभविनाशनम् । १६। हे गंगे ! आपके तट पर, वास करता हुआ और आपके निर्मल जल में स्नान करता हुआ मैं कब आपके दर्शन करूँगा ? कब आपका नाम स्मरण करता हुआ आपके अवतरण की पुनीत गाथा का गान करूँगा ? आपकी सेवा करने के फल रूप में मेरे हृदय में आपकी भक्ति

४०५ + ३२ = ५३७ ] [ कल्कि-पुराण का सञ्चार कब होगा ? मेरे द्वारा किये हुए पाप कब नष्ट होगे ? कब मैं शान्त चित्त से पृथिवी पर विचरण करता हुआ आदर को प्राप्त हूँगा ? । १२। इस ऋषि प्रोक्त गंगा-स्तव का इस प्रकार पाठ किया गया । इसके पढने और सुनने से यश-लाभ होता तथा आयु की वृद्धि होती है । १३। इस स्तोत्र का प्रातः मध्याह्न और साय—तीनो काल पाठ करने से गंगा जी का सान्निध्य प्राप्त होकर सब पापो का क्षय तथा बल और आयु की वृद्धि होती है । १४। इस भार्गवाख्यान का मैने शुकदेवजी से श्रवण किया था । यह पढन और सुनने से पुण्यप्रद तथा धन और यश के बढाने वाला है ।१५। भगवान् कल्कि के अवतार विषयक अद्भुत उपाख्यान का भक्ति सहित पाठ अथवा श्रवण करने पर सब प्रकार के अमगलो का का नाश हो जाता है ।१६।

तृतीयांश— एकविंश अध्याय अत्रापि शुकसम्बादो मार्कण्डेयेन धीमता । अधर्मवंशकथन कलेर्विवरण तत ।१। देवानाब्रह्मसदन प्रयाण गोभुवा सह । ब्रह्मणो वचनाद्विष्णोर्जन्म विष्णुयशोगृहे ।२। सुमत्यस्वाशकैर्भ्रातृचतुर्भिः शम्भले पुरे । पितुः पुत्रेण सम्बादस्तथोपनयन हरे ।३। पुत्रेण सह सवासो वेदाध्ययनमुत्तमम् । शस्त्रास्त्राणा परिज्ञान शिवसदर्शन तत ।४। कल्के. स्तव शिवपुरो वरलाभ शुकापनम् । शम्भलागमन चक्रे ज्ञातिभ्यो वरकीर्तनम् ।५। सूतजी बोले—इस पुराण मे प्रथम मार्कण्डेयजी और शुकदेवजी का सम्वाद वर्णन हुआ है । फिर अधर्म के वंश का वर्णन और कल्किजी का प्रसंग आया है । इसके अनन्तर गोरूप धारिणी पृथिवी के देवताओ के साथ ब्रह्मलोक गमन और विष्णुयशजी के घर कल्किजी के जन्म लेने की कथा कही गई । तत्पश्चात् भगवान् विष्णु के अंश से चारो भाइयो के शम्भल ग्राम मे अवतरित् होने का उपाख्यान, पिता-पुत्र-संवाद और कल्किजी के उपनयन संस्कार का विवरण है ।१ ३। फिर पिता पुत्री का साथ साथ रहना, कल्किजी का वेद शास्त्रो तथा शस्त्रास्त्र की शिक्षा पाने की और भगवान् शंकर के दर्शन होने की कथा कही गई है ।४। तदनन्तर कल्किजी द्वारा शंकर-स्तवन और वर प्राप्त करना और शिवजी ५०६+३२=५३८

सप्तम अध्याय-३ ] [ ५३६ द्वारा प्रदत्त शुक के सहित उनका शभल ग्राम को लौटना तथा जाति बन्धुओ से वर प्राप्ति का वर्णन किया गया है ।५। वशाख्यूपभूपेन निजसर्वात्मवर्णनम् । महाभाग्याद्ब्राह्मणाना शुकस्यागमन तत. ।६। कल्किना शुकसम्वाद सिंहलाख्यानमुत्तमम् । शिवदत्तवरा पद्मा तस्या भूपस्वयं वरे ।७। दर्शनाद्भूपसघाना स्त्रीभावपरिकीर्त्तनम् । तस्या विषाद, कल्केस्तु विवाहार्थ समुद्यमः ।८। शुकप्रस्थापन दौत्ये तया तस्यापि दर्शनम् । शुकपद्मापरिचयः श्रीविष्णु पूजनदिकम् ।६। पादादिदेहध्यानञ्च केशान्त परिवर्णितम् । शुकभूषादानञ्च पुन शुकसमागम ।१०। फिर विशाखयूप नरेशके प्रति कल्किजी द्वाराअपने स्वरूपका और ब्राह्मण-माहात्म्य का वर्णन करना तथा शुक के आगमनकी कथा कही गई है ।३। फिर कल्कि-शुक सवाद, शुक द्वारा सिंहल द्वीप वर्णन, शिव द्वारा पद्मा को वर प्राप्ति का प्रसग पद्मा के स्वयवर मे आये हुए राजाओ को स्त्रीत्व प्राप्ति का वर्णन तथा पद्मा के सताप की चर्चा और विवाह के लिए कल्किजी के उद्यम की कथा कही गई है ।७-८। शुक का दूत- भाव से प्रस्थान, पद्मा और शुक की भेट तथा दोनो के परिचय का प्रसग और विष्णु भगवान् के पूजन की कथा हैं ।६। तदुपरान्त चरण से केश पर्यन्त, भगवान् के ध्यान करने का प्रसग, शुक को आभूषण-दान और शुक का कल्किजी के पास लौटना-यह कथा वर्णित हुई है ।१०। कल्के. पद्माविवाहार्थ गमन दर्शन तयो । जलक्रीडाप्रसङ्गेन विवाहस्तदनन्तरम् ।११। पु स्त्वप्राप्तिश्च भूपाना कल्केदर्शनमात्रत· । अनन्तागमन राज्ञा सम्वादस्तेन ससदि ।१२।

५४० ] [ कल्कि पुराण षण्डत्वादात्मनो जन्म कर्म चात्र शिवस्तवः। मृते पितरि तद्विष्णोः क्षेत्रे माया प्रदर्शनम् ।१३। आख्यानमन्तस्तस्य ज्ञानवैराग्यवैभवम् । राज्ञा प्रयाण क केश्च पद्माया सह शम्भले ।१४। विश्वकर्मविधानञ्च वसति पद्माया सह । ज्ञातिभ्रातृसुहृत्पुत्रै सेनाभिर्बौद्धनिग्रह ।१५। तदनन्तर विवाह के उद्देश्य से कल्किजी का गमन, जल क्रीडा के प्रस ग द्वारा कल्किजी और पद्मा का पारस्परिक परिचय और इनके विवाह का प्रस ग कहा गया है ।११। फिर स्त्रीत्व को प्राप्त हुए राजा- गण का कल्कि-दर्शन से पुन. पुरुषत्व की प्राप्ति, अनन्त मुनि का सभा मे आगमन और राजाओ से सम्वाद की कथा का वर्णन है ।१२। षण्ड रूप से अनन्त मुनि के जन्म का वर्णन, शिवजी की स्तुति और अनन्त मुनि के पिता के परलोक-गमन के पश्चात् विष्णु क्षेत्र मे भगवती माया के दर्शन का प्रस ग कहा गया है ।१३। तदनन्तर अनन्त का आख्यान, ज्ञान एंव वैराग्य रूप एश्वर्य का प्रस ग, फिर राजाओ का प्रयाण और पद्मा सहित कल्किजी के शम्बल-गमन की कथा कही है ।१४। फिर विश्वकर्मा द्वारा शम्बलपुरी का निर्माण और उसमे पद्मा, जाति-बांधव, भ्रात गण, सुहृद्जन, पुत्रादि तथा सेना के सहित कल्किजी का निवास और बौद्धो के निग्रह की कथा वर्णन की गई है ।१५।

  • कथितश्चात्र तेषाञ्च स्त्रीणां सयोधनाश्रयः । नतऽत्रो बालखिलीना मुनीना रवानिवेदनम् ।१६। सपुत्राया. कुथोदर्या वधश्चात्र प्रकीर्त्ततः । हरिद्वारगतस्यापि कल्केर्मु निसमागम ।१७। सूर्य्यवंशस्य कथेन सोमस्य च विधानत. । श्रीरामचरित चारुसूर्य्यवंशानुवर्णने ।१८। देवापेरच मरो सद्यो युद्धयात्र प्रकीर्तित. ।

एकविश अध्याय-३ ] [ ५४१ महाघोरवनेकोक विकोकविनिपातनम् ।१६। भल्लाटगमन तत्र शय्याकरणादिभि सह । युद्ध शशिध्वजेनालु सुशान्ता भक्तिकीर्तनम् ।२०। तदुपरान्त बौद्धो की नारियो का रणक्षेत्र मे युद्ध के उद्देश्य से श्रागमन, बालखिल्य मुनियो का श्रागमन और अपने वृत्तान्त का वर्णन ।१३। फिर कुथोदरी नाम की राक्षसी का अपने पुत्र के सहित मारा जाना तथा हरिद्वार मे कल्किजी से मुनियो का मिलना कहा गया है ।१७। फिर सूर्यवंश और चन्द्रवंश का वर्णन तथा सूर्यवंश के प्रस ग में भगवान् श्री राम का चरित्र-वर्णन हुआ है ।१८। फिर मरु और देवापि का युद्ध के लिए आगमन, अत्यन्त विकराल कोक-विकोक का वध, कल्किजी की भल्लाट नगर-यात्रा, शय्याकरण आदि से युद्ध, शशिध्वज-कल्किजी का स ग्राम और सुशांता द्वारा भक्ति एव कीर्तन की कथा कही गई है ।१६-२०। युद्धे कल्केरानयन धर्मस्य च कृतस्य च । सुशान्तायाः स्तवस्तत्र रमोद्वाहस्तु कल्किना ।२१। सभाया पूर्वकथन निजगृहत्वकारणम् । मोक्ष शशिध्वजस्यात्र भक्तिप्रार्थयितुर्विभो ।२२। विषकन्यामोचनञ्च नृपाणामभिषेचनम् । मायास्तव, शम्भलेषु नानायज्ञादि साधनम् । नारदाद्विष्णुयशसो मोक्षश्चात्र प्रकीर्तितः । कृतधर्म प्रवृत्तिश्च रुक्मिणी व्रतकथनम् ।२४। ततो विहारः कल्केश्च पुत्रपौत्रादि सम्भवः । कथितो देवगन्धर्वगणागमनमत्रहि ।२५। फिर युद्ध क्षेत्र से कल्किजी, धर्म और सत्युग का शशिध्वज द्वारा अपने घर लाना, रानी सुशान्ता द्वारा कल्किजी का स्तव और कल्कि-रमा विवाह का प्रस ग कहा गया है ।२१। फिर राजा शशिध्वज

५४२ [ कल्कि-पुराण का अपने पूर्व-जन्मो का वृत्तान्त-कथन, गृद्ध देह प्राप्ति का प्रस ग, कल्किजी के प्रति भक्ति का निवेदन और और राजा शशिश्वज को मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन हुआ है ।२२। विषकन्या का उद्धार, राजाओ का राज्याभिषेक, भगवती माया का स्तव तथा शम्भल ग्राम मे विविध यज्ञो का अनुष्ठान ।२३। तदनन्तर विष्णुयश जी का नारदजी से मोक्ष-विषयक प्रश्न, लोक मे सत्युग का स्थापन और रुक्मिणी व्रत का प्रम ग ।२४। फिर कल्किजी का विहार-वर्णन, पुत्र-पौत्रादि की उत्पत्ति और देव- ताओ तथा गधर्वो के शम्भल ग्राम मे आगमन की कथा कही गई है ।२५। ततो वैकुण्ठगमन विष्णो. कल्केरिहादितम् । शुकप्रस्थान मुचित कथयित्वा कथां शुभा ।२६। गंगास्तोत्रनिह प्रोक्त पुराणे मुनिसमतम् । जगतामानन्दकर पुराण पच लक्षणम् ।२७। चतुवर्ग प्रद कल्कि पुराण परिकीर्तितम् । प्रलयान्ते हरिमुखान्निः सृत लोक विस्तृतम् ।२८। अहोव्यासेन कथित द्विजरूपेणभूतले । विष्णोः कल्केर्भगवत. प्रभाव परमाद्भु तम् ।२९। येभक्त्यात्र पुराणसारममल श्रीविष्णु भावाप्लुत । शृण्वन्तीह वदन्ति वदन्ति साधुसदसि क्षेत्रे सुतीर्थाश्रमे । दत्त्वागा तुरगज गजवर स्वर्णां द्विजायादरात् वस्त्रालङ्करणै प्रपज्यविधिवन्मुक्तास्त एवोत्तमाः ।३०। फिर कल्किजी के वैकुण्ठ-गमन का वर्णन करके शुकदेव जी का कथा समाप्त करके चले जाना कहा गया है ।२६। फिर इस पुराण में मुनियो द्वारा कथित गंगास्तोत्र का वर्णन हुआ है । स सार को आनन्द देने वाला यह पुराण पांच लक्षणो से सम्पन्न है ।२७। यह कल्किपुराण, कीर्तन करने से, चतुवर्ग के देने वाला है । प्रलय के अन्त

एकविंश अध्याय ] [ ५४३ मे यह भगवान् श्रीहरि के मुख से निसृत होकर ससार मे विस्तार को . को प्राप्त हुआ है ।२८। फिर इस पुराण को ब्राह्मण रूप मे पृथिवी पर अवतरित होकर भगवान् वेदव्यासजी ने कहा । इसमे कल्कि स्वरूप भगवान् विष्णु के अत्यन्त अद्भुत प्रभाव का वर्णन किया गया हैं ।२६। सभी पुराणो के सार रूप इस कल्कि पुराण का जो साधुजन भगवान् विष्णु के भक्ति भाव मे मग्न होकर किसी आश्रम या पुण्यतीर्थ मे स्थिति होकर वस्त्रा भूषणो द्वारा ब्राह्मणो का सत्कार करते हुए तथा उन्हे गज, अश्व, गो, आदि धन दान देते हुए श्रवण अथवा कीर्तन करेगे उनको अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी ।३०। श्रुत्वा विधान विधिवद्ब्राह्मणो वेद पारग । क्षत्रियो भूपतिर्वैश्यो धनीशूद्रो महान्भवेत् ।३१। पुत्रार्थी लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम् । विद्यार्थी लभते विद्या पठनाच्छ्रवणादपि ।३२। इत्येतत्पुण्यमाख्यान लोमहर्षण जो मुनि । श्रावयित्वामुनीन्भक्त्या ययौ तीर्थाटनादृतः ।३३। शौनको मुनिभिः सार्द्धं सूतमामन्त्र्यधर्मवित् । पुण्यारण्ये हरि ध्यात्वा ब्रह्म प्राप सहर्षिभि ।३४। लोमहर्षणज सर्वपुराणज्ञ यतव्रतम् । व्यासशिष्य मुनिवर त सूत प्रणमाम्यहम् ।३५। इस पुराण के विधी पूर्व क श्रवण करने वाला ब्राह्मण वेद मे पारगत होता है, क्षत्रिय को राज्य की प्राप्ति होती है, वैश्य धनी और शूद्र महान् हो जाता है ।६१। यदि पुत्र की कामना से इसका श्रवण करे तो पुत्र-लाभ, धन की इच्छा वाले को धन लाभ और विद्या के अभिला- षियो को विद्या की प्राप्ति होती है ।३२। लोमहर्षणसुत मुनिवर सूतजी ने भक्ति भाव सहित यह पुण्य आख्यान शौनकादि मुनियो को सुनाया

५४४ ] कल्कि पुराण और फिर तीर्थाटन को चले गये ।३३। इसके पश्चात् मंत्रवित् एवं धर्म- ज्ञाता मुनिवर शौनकजी अन्यान्य मुनियो के सहित भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए ब्रह्म को प्राप्त हो गये ।३४। सर्वं पुराणो के ज्ञाता, व्यासजी के परम शिष्य, लोमहर्षणपुत्र उन मुनिश्रेष्ठ सूतजी को मैं प्रणाम करता हूँ ।३५। आलोक्य सर्व शास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । इममेव सुनिष्पन्न ध्येयो नारायणः सदा । ३६। वेद रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।३७। सजलजलददेहो वातवेगैकवाहः करधृतकरवाल. सर्वलोकैकपालः । कलिकुल वनहन्ता सत्यधर्म प्रणेता । कलयतुकुशलवः कल्किरूपः सभूप. ।३८। सभी शास्त्रो के अध्ययन और उन पर बारम्बार विचार करने से यही निष्कर्ष निकलता है कि सदैव भगवान् श्रीनारायण का ध्यान करना ही श्रेयस्कर है ।६३। क्योकि वेद, पुराण, रामायण और महा भारत आदि सभी शास्त्रो ने अपने आदि, मध्यादि मे सर्वत्र इन्ही भव- वान् श्रीहरि का गुण-कीर्त्तन किया हैं ।३७। जलयुक्त मेघ जैसे वर्ण वाले वायु के समान वेग वाले अश्वारूढ होने वाले, हाथ मे तलवार धारण करने वाले, सत्य- धर्म के प्रणेता, राजाओ के सहित निवास करने वाले कलियुग के परिवार रूपी वन का हनन करने वाले भगवान् कल्किजी हमारा कल्याण करे ।३८। ः श्री कल्कि पुराण सम्पूर्ण ः