कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० ] [ कल्कि पुराण तदद्भुतरूपमवेक्ष्य पद्मा सस्तम्भिताविस्मृतसत्क्रियार्था सुप्तं तु सबोधयितुं प्रवृत्तं निवारयामाविशङ्कितात्मा ।२२ कदाचिदेषोऽतिबलोऽतिरुपी मद्दर्शनात्स्त्रीत्वमुपैति साक्षात् । तदात्र किं मे भविता भवस्य वरेण शापप्रति- मेन लोके ।२३। चराचरात्मा जगतामधीश प्रबोधितस्तद्धृदयं विविच्य । ददर्श पद्मा प्रियरूपशोभा यथा रमा श्रामधुसूदनाग्रे ।२४। सवीक्ष्य मायामिव मोहिनी तां जगाद कामाकुलितः स कल्किः । सखीभिरीशां समुपागतां तां कटाक्षविक्षेपवि- नामितास्यम् ।२५। उसने देखा कि तमाल जैसे नीलवर्ण वाले, पीताम्बरधारी, कमल जैसे नेत्र वाले, लम्बी भुजाओ, विशाल वक्ष और श्रीवत्स से चिन्हित हृदय वाले, कौस्तुभ मणि की कान्ति से प्रकाशित भगवान् कल्कि विराजमान है ।२१। उस अद्भुत रूप को देखकर पद्मा ऐसी स्तम्भित हुई कि उनका सत्कार भी करना भूल गई और उसने शंका के कारण उन्हे जगाना उचित नहीं समझा ।२२। उसने सोचा कि कहीं यह महा- बली अत्यन्त रूपवान् पुरुष मुझे देखकर स्त्री न बन जाय ? यदि ऐसा हो गया तो शिवजी का वरदान यहाँ भी अभिशाप हो जायगा ।२३। फिर पद्मा के आन्तरिक अभिप्राय को जान कर चराचर के एव विश्वेश्वर कल्कि भगवान जाग पडे । उन्होंने देखा कि लक्ष्मीजी के समान महान् रूपवती पद्मा सामने खडी है ।२४। सखियों के सहित आई हुई, अपलक देखता हुई पद्मा को देखकर उस मोह को उत्पन्न करने वाली पद्मा से कल्किजी सकाम-भाव पूर्वक बोले ।२५। इहैहि सुस्वागतमस्तु भाग्यात्समागमस्ते कुशलाय मे स्यात् । त्वदाननेन्दुः किल कामपूरस्तापापनोदाय सुखाय कान्ते! २६।