भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

प्रथम अध्याय-१ [ ३१६ तासा मुखामोदमदान्धभृङ्गा विहाय पद्मानि मुखारविन्दे। लग्नाः सुगन्धाधिकमाकलय्य निवारिताश्चापि न तत्यजुस्ते ।१७। हासोपहासैः सरसप्रकाशैर्वाद्यैश्च नृत्यैश्च जले विहारै । करग्रहैंस्ता जलयोधनात्ततश्चिकर्ष ताभिर्वनिताभिरुच्चे १८। सा कामातप्ता मनसा शुकोक्ति विविच्य पद्मा सखिभिः समेता । जलात्समुत्थाय महाहंभूषा जगाम निर्दिष्टकदम्बषण्डम् ।१६। सुखे शयानं मणिवेदिकागतं कल्कि पुरस्तादतिसू- र्य्यवर्चसम् । महामणिव्रातविभूषणाचित शुकेन सार्द्धं तमुदैक्षतेशम् २०। फिर सारस, हंस आदि के मधुर निनाद और पद्म-रेणु से सुगंधित सरोवर के जल में स्नान करके वह चन्द्रवदनी स्त्रियां कुमुदनी युक्त चन्द्रमा की आशा मे विचरण करने लगी । उनके देह की कमल- गंध से मत्त हुए भ्रमर उनके मुखो पर गुजारने लगे । स्त्रियो द्वारा उडाये जाने पर भी वे भ्रमर उन पद्मगन्धाओ के मुखो से हटते ही नही थे ।१६-१७। रसमय हास-परिहास, वाद्य, नृत्य तथा परस्पर हाथ पकडे हुए विविध प्रकार का जलविहार करती हुई पद्मा ने सखियो के मन को और सखियो ने पद्मा के मन को हर लिया ।१८। फिर सकाम भाव वाली पद्मा शुक के वचनो का स्मरण करके सखियो सहित जल से बाहर निकली और वस्त्राभूषणो से विभूषित होकर उस बताये हुए महान् कदम्ब के वृक्ष के नीचे गई ।१६। वहाँ उसने मणिमय चबू- तरे पर महामणियो से विभूषित, सूर्य के तेज से भी अधिक तेजोमय कल्किजी को शुक के सहित सुखपूर्वक शयन करते देखा ।२०। तमालनील कमलापति प्रभु पीताम्बर चारुसरोजलोचनम् । आजानुबाहुं पृथूपीनवक्षस श्रीवत्ससत्कौस्तुभकान्तिराजितम्