भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 259 में से

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पृष्ठ 74

कल्कि पुराण [ ३२७ मर्त्यलोक या पाताल लोक मे कही भी, किसी के द्वारा भी मरने वाला नही था । इन सब बातो पर विचार करके आपने नृसिंहावतार धारण किया और जब आपके उग्र रूप को देख क्रोधित हुआ दैत्य आपसे युद्ध करने लगा, तब आपने अपने नखाग्रो से उसका देह विदीर्ण कर डाला ।२४। फिर त्रैलोक्य विजयी राजा बलि के यज्ञ मे आपने इन्द्र के लघु भ्राता बन कर वामनावतार धारण कर दानवराज के समोहनार्थ तीन पद पृथिवी माँग ली । उत्सर्ग के लिये जल छोडते ही आपने छलपूर्वक विराट् स्वरूप धारण किया । फिर आप त्रैलोक्यदान के फलस्वरूप राजा बलि के द्वारपाल बन गये ।२५। फिर जब महाबल-पराक्रम वाले हैहय आदि राजाओ ने धर्म की मर्यादा को लाँघा, तब आपने उनके विनाशार्थ भृगुवंश मे परशुराम का अवतार लिया और अपने पिता की होमधेनु के हर लिये जाने पर आपने इक्कीस बार इस पृथिवी को क्षत्रियो से रहित कर दिया ।२६। पुनरिह पुलस्त्यवंशावत सस्य विश्रवस पुत्रस्य निशाचरस्य रावणस्य लोकत्रयतापनस्य निधनमुररीकृत्य रविकुलजातद- शरथात्मजो ऽथस्वामित्रादस्त्राण्युपलभ्य वने सीताहरणाश्रा त्प्रवृद्धमन्युना अम्बुधिं वानरैर्निबध्य सगणं दशकन्धरं हतवा- नसि रामावतारः ।२७। पुनरिह यदुकुल-जलधिकलानिधि सकलसुरगणसेवितपादार- विन्दद्वन्द्वः विविधदानवदैत्यदलनलोकत्रयदुरिततापनो वसुदे- वात्मजो रामावतारो बलभद्रस्त्वमसि ।२८। पुनरिह विधिकृत-वेदधर्मानुष्ठान-विहित-नानादर्शनसघृण ससारकर्मत्यागविधिना ब्रह्माभासविलासचातुरी प्रकृतिवि- माननामसम्पादयन् बुद्धावतारस्त्वमसि ।२६। फिर पुलस्त्यवंशावतंस विश्रवापुत्र रावण ने अपने बल से तीनो लोको को भय-सतप्त कर दिया, तब आपने उसका विनाश करने के लिये सूर्यवंशी राजा दशरथ के यहाँ अवतार लिया और विश्वामित्र से अस्त्र-

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