भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

द्वितीयांश— पंचम अध्याय उपविष्टे तदा हंसे भिक्षां कृत्वा यथोचिताम् । तत प्राहुरनन्तस्य शरीररोगकाम्यया ।१। हंसस्तेषां मतं ज्ञात्वा प्राह मां पुरतः स्थितम् । तव चारुमती भार्या पुत्रः पञ्च बुधादयः ।२। धनरत्नन्वितं सद्मा सम्बाधं सौवस्रकुलम् । त्यक्त्वा कदागतोऽसीह पुत्रोद्वाहदिने न तु ।३। समुद्रतीरसञ्चारः पुराद्धर्म्यजनादृतः । निमन्त्र्य मामिहायातः शोकसंविग्नमानसः ।४। त्वञ्च सप्ततिवर्षीयस्तत्र दृष्टो मया प्रभो ! । त्रिंशद्वर्षीयवत्कस्मादिति मे संभ्रमो महान् ।।५।। सूतजी बोले — यथोचित भिक्षा प्राप्त करके परमहंस जब विराजमान हुए, तब पुरुषोत्तम तीर्थ के निवासियो ने उनसे पूछा कि अनन्त का शरीर रोग-रहित कब होगा ? ।१। परमहंस उनके प्रश्न का तात्पर्य जान कर और मुझे अपने समक्ष स्थित देख कर बोले — हे अनन्त ! तुम अपनी पत्नी चारुमती, बुधादि पाँचो पुत्र धन रत्नादि से युक्त भवन आदि को त्याग कर यहाँ कब आये ? क्या आज तुम्हारे पुत्र का विवाह-दिवस है ? ।२-३। मैं आज भी तुम्हे इस समुद्र तट पर घूमते देखता हूँ । वहाँ के सभी धार्मिक व्यक्ति तुम्हारा आदर करते हैं । मैं भी आज निमंत्रित हूँ । परन्तु तुम यहाँ आकर शोक से सन्तप्त होरहे दिखाई देते हो ।४। हे प्रभो ! वहाँ तो तुम सत्तर वर्ष के वृद्ध थे, परन्तु २२९