भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

३४० ] [ कल्कि पुराण यहाँ तीस वर्ष के युवक कैसे दिखाई दे रहे हो ? ।५। इय भार्या सहाया ते न तत्रालोकिता क्वचित् । अह वा क्व कुतस्तस्मात्क्व वा काशित् ।६। स एव वा न वापि त्व नाह वा भिक्षुरेव स. । आवयोरिह सयोगश्चेन्द्रजाल इवाभवत् ।७। त्व गृहस्थ. स्वधर्म्मज्ञो भिक्षुकोऽह परात्मक. । आवयोरिह सवादो बालकोन्मत्तयोरिव '८। तस्मादीशम्य मायेय त्रिजन्मोहकारिणी । ज्ञानाप्राप्याद्वैतलभ्या मन्येहमिति भा द्विज । ।६। तुम्हारी इस सहायिका भार्या को मैंने वहाँ कभी भी नही देखा । मैं भी यह नही जानता कि मैं इस स्थान पर कहाँ से और किस प्रकार आ गया ? तथा मुझे यहाँ कौन लाया है ? ।६। क्या तुम वही अनन्त हो या और कोई हो ? मैं भी वही भिक्षुक हूँ या कोई अन्य हूँ ? यहाँ मेरा तुम्हारा मिलन भी इन्द्रजाल के समान ही प्रतीत होता है ।७। तुम अपना धर्म का पालन करने वाले गृहस्थ हो और मैं परमार्थ चिन्तक भिक्षुक । यहाँ हम-तुम दोनो का पारस्परिक सवाद एक बालक और उन्मत्त के सवाद के समान निरर्थक है ।८। हे द्विज ! इससे मैं समझता हूँ कि यह भगवान् की त्रैलोक्य-मोहिनी माया है । इस माया का रहस्य साधारण ज्ञान से नही, अद्वैत बुद्धि से ही समझा जा सकता है ।६। इति भिक्षुः समाश्राव्य यदन्यत्प्राह विस्मित. । मार्कण्डेय ! महाभाग ! भविष्य कथयामि ते ।१०। प्रलये या त्वया दृष्टा पुरुषस्योदराम्भसि । सा माया मोहजनिका पन्थानं गणिका यथा ।११। तमोह्ययननसन्तापा नोदनोद्यतमक्षरी ययेदमखिलं लोकमवृत्या वस्थयास्स्थितम् ।१२। लये लीने त्रिजगति ब्रह्मातन्मात्रतां गतः । निरुपाधौ निरालोके सिसृक्षुरभवत् परः ।१३।