भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

पञ्चम अध्याय - २ ] [ ३४१ ब्रह्मण्यपि द्विधाभूते पुरुष प्रकृती स्वयं । भासा सजनयामास महान्तं कालयोगतः ।१०। कालस्वभावकर्मात्मा सोऽहङ्कारस्ततोऽभवत् त्रिवृद्विष्णु-शिव-ब्रह्म-मयः ससारकारणम् ॥१५॥ विस्मयान्वित हृदय से भिक्षुक परमहंस ने मुझसे इतना ही कहा। फिर उन्होंने मार्कण्डेय से कहा - हे मार्कण्डेय ! हे महाभाग ! मैं अब तुम्हें भविष्य की बात सुनाता हूँ ।१०। प्रलयकाल मे उस परम पुरुष के उदर में स्थित जल मे, पथ मे बैठने वाली गणिका के समान, सब मे मोह उत्पन्न करने वाली माया निवास करती है ।११। तमोगुण रूप हुई यही माया अनन्त सन्ताप उत्पन्न करने वाली और इस मिथ्या जगत में सब की गति करने वाली है। यही माया तीनो लोको मे व्याप्त होकर उन्हें स्थित करती है । इस मायाका नाश संभव नही है ।१२। प्रलयकाल मे तीनो लोको के लीन होजाने पर सर्वत्र अंधकार छा जाता है, तब दिशा देश और काल आदि का भी कोई चिह्न नही रहता। उस समय ब्रह्म ही सृष्टि करने की इच्छा से, अपनी हीं महिमा द्वारा प्रकृति और पुरुष इन दो रूपो मे विभक्त हो जाते हैं। तब काल के सह- योग से प्रकृति और पुरुष, का सयोग होने पर महत्तत्व उत्पन्न होता है ।१३-१४। प्रकृति से काल और स्वभाव उत्पन्न हुए । महत्तत्व से अह- कार हुआ। वही अहंकार तीनो गुणो मे विभक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव को उत्पन्न करने वाला हुआ। यही ब्रह्मा, विष्णु और शिव सम्पूर्ण विश्व के कारण हैं ।१५। तन्मात्राणि ततः पञ्च जज्ञिरे गुणवन्ति च । महाभूतान्यपि ततः प्रकृतौ ब्रह्मसंश्रयात् ।१६। जाता देवासुरनरा ये चान्ये जीवजातयः । ब्रह्माण्डभाण्डसम्भार-जन्मनाशक्रियात्मिकाः ।१७ मायया मायया जीव-पुरुष परमात्मनः । ससारशरणाव्यग्रो न वेदात्मगति क्वचित् ।१८ अहो बलवती माया ब्रह्माद्या यद्वशे स्थितः ।