भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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३४४ ] [ कल्कि पुराण हे अनन्त ! हम दिशा, वात, प्रचेता, अश्विद्वय, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र और मित्र देवता हैं । ३०। इन्द्रियाणां वयं देवास्तव देहे प्रतिष्ठिताः । नखाग्रकाण्डसभिन्नान्नास्मान्कर्तु मिहार्हसि । ३१ न श्रयो हि तवानन्त ! मनोनिग्रहकर्मणि । छेदने भेदनेऽस्माकं भिन्नमर्मा मरिष्यसि । ३२। अन्धानां बधिराणाञ्च विकलेन्द्रियजीविनाम् । वनेऽपि विषयव्यग्र मानस लक्षयामहे । ३३। जीवस्यापि गृहस्थस्य देहो गेह मनोज्ञनुग । बुद्धिर्भार्या तदनुगा वयमित्यवधारय । ३४। कर्मायत्तस्य जीवस्य मनो बन्धविमुक्तिकृत् । संसारयति लुब्धस्य ब्रह्मणो यस्य मायया । ३५। हम दश इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवगण तुम्हारे देह मे स्थित हैं। हमको नखाग्र से छिन्न-भिन्न करना सर्वथा अनुचित है । ३१। इस प्रकार मन को वश करने के प्रयत्न मे तुम्हारा कल्याण नही होगा । इन्द्रियो के छेदन-भेदन से मर्मस्थल आहत हो जायगा तो तुम्हारी मृत्यु हो जायगी । ३२। अन्धे, बहरे अथवा विकल इन्द्रियो वाले जीव भी निर्जन वन मे वास करते हुए विषयासक्त दिखाई देते हैं । ३३। जीव रूपी गृहस्थ का घर यह देह ही है तथा मन की अनुगता बुद्धि ही इसकी भार्या है। इस प्रकार हम सभी उस बुद्धि रूपी भार्या के ही अनुगत रहते हैं । ३४। सभी जीव अपने कर्म के वश मे हैं । मोक्ष और बन्धन का कारण मन है। प्रभु-माया का अनुगत हुआ मन ही इस लोलुप प्राणी को भवचक्र मे डालता रहता है । ३५। तस्मान्मनोनिग्रहार्थं विष्णुभक्ति समाचर । सुखमोक्षप्रदा नित्य दाहिका सर्वकर्मणाम् ॥३६॥ द्वैताद्वैतप्रदान्दन्दस् न्दोहा हरिभक्तिका । हरिभक्त्या जीवकोष-विनाशान्ते महामते । । ३७।