भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पंचम अध्याय-२ ] [ ३४५ परं प्राप्स्यसि निर्वाण कल्केरालोकनात्तया । इत्यह बोधितस्तेन भक्तवा सुपूज्य केशवम् ।३८। कल्कि दिदृक्षुरायात. कृष्णं कलिकुलान्तकम् ।।३६।। दृष्ट रूपमरूपस्य स्पृष्टस्तत्पदपल्लवः । अपदस्य श्रुत वाक्यमवाच्यस्य परात्मनः ।४०। इसलिए यदि मन का निग्रह करना है तो भगवान् विष्णु की भक्ति करो । क्योकि वही सब कर्मोकी दाहिका और मोक्ष-सुख के देने वाली है ।।३६।। हरि-भक्ति ही द्वैत-अद्वैत का ज्ञान एव आनन्द और सन्दोह के देने वाली है, उसी के द्वारा जीवकोष का दमन सम्भव है ।३७। कल्कि भगवान् के दर्शन करने से ही तुम मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे । परमहंस का यह उपदेश सुनकर मैं भक्ति सहित भगवान् केशव का पूजन करके कलिकुलनाशक कल्किरूप श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ यहाँ उपस्थित हुआ । ।३८-३६। यहाँ आकर निराकार ईश्वर के रूप का मुझे दर्शन हुआ । चरण-रहित परमात्मा के चरण-स्पर्श का सौभाग्य प्राप्त हुआ और अवाच्य प्रभु की वाणी सुनाई दी ।४०। इत्यनन्तः प्रमुदितः पद्मानाथ निजेश्वरम् । कल्कि कमलपत्राक्ष नमस्कृत्य ययौ मुनिः ।।४१।। राजानो मुनिवाक्येन निर्वाण-पदवी गता. । कल्किमभ्यर्च्य पद्माञ्च नमस्कृत्य मुनिव्रता. ।।४२।। अनन्तस्य कथामेतामज्ञानध्वान्त-नाशिनीम मायानियन्त्रीं प्रपठञ्छृण्वन्बन्धाद्विमुच्यते ।।४३।। संसाराब्धि-विलासलासमति. श्रीविष्णुसेवापरो भक्त्याख्यानमिद स्वभेद-रहितं निर्माय धर्मात्मना । ज्ञानोल्लास-निशात-खड्गमुदित. सद्भक्ति-दुर्गाश्रयः षड्वर्गञ्जयतादशेषजगतामात्मस्थित वैष्णव. ॥४४॥ यह कह कर अत्यन्त हर्षित हुए मुनिवर अनन्त पद्मपत्राक्ष एवं पद्मा के पति भगवान् कल्कि को नमस्कार करके वहाँ से चले गये ।४१।